
अथ अश्विनीशान्ति प्रयोग
मूलशांतिवत् स्वस्तिक पीठ पर नक्षत्र मण्डल बनायें ।
अश्विनी नक्षत्र शांति हेतु अश्विन की मूर्ति बनायें । प्रधान कलश पर अश्विन्यधिष्ठित देव का आवाहन करें – ॐ अश्विना तेजसा चक्षुः प्राणेन सरस्वती वीयम् । वाचेन्द्रो बलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियं स्वाहा । ॐ अश्विन्यधिष्ठित अश्विनौ इहागच्छ इह तिष्ठ ।
कलश के दांयी ओर ( अधिदेवता ) ॐ पूषन्तव व्रते वयं न्न रिष्येम कदाचन । स्तोतारस्त इह स्मसि स्वाहा । ॐ रेवत्यधिष्ठित पूषन् इहागच्छ इह तिष्ठ ।
कलश के बांयी ओर ( प्रत्यधिदेवता ) ॐ यमाय त्वाङ्गिरस्वते पितृमते स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मपित्रे स्वाहा । ॐ भरण्यधिष्ठित यम इहा . इह .॥
शेष २४ नक्षत्रों के अधिष्ठित देवताओं का आवाहन २४ दल पद्म में पूर्वादि क्रम से- ” कृत्तिकाधिष्ठित अग्ने इहागच्छ इह तिष्ठ । “ से प्रारम्भ कर ” उत्तराभाद्र पदाधिष्ठित अहिर्बुध्य इहागच्छ इह तिष्ठ ” तक आवाहन करें
चारों दिशाओं के कलशों का पूजन , शान्तिजप , होम , अभिषेक एवं शेष कर्म मूल शान्तिवत् करें ।
॥ इति अश्विनीशान्ति प्रयोगः ॥
