
अथ मूलशान्ति प्रयोग
प्रथम दिन २७ तरह के पेड़ों की पत्तियां , २७ जगह का जल , २७ तरह का अनाज , २७ जगह व चौराहे की मिट्टी , बाँस की छबड़ी कांसी का पात्र , स्वर्ण का टुकड़ा इत्यादि का संग्रह कर लेवें ।
प्रयोग के दिन प्रात : काल ज्योतिषि डाकोत ( डगऋषि की संतान ) को सूर्योदय से पहले बुलाये । उपरोक्त सभी वस्तुओं के दो भाग कर लेवें ।
ब्राह्मण सुबह जल्दी आकर माता – पिता व जातक को बिठाकर अभिषिक्त करता है । आसन चौकी के नीचे लकड़ी का छोटा हल भी बनाकर रखते है । इसके बाद स्नान करें एवं वस्त्रों का परित्याग करें । ब्राह्मण को कांसी की कटोरी में घी , सुर्वण , दक्षिणा डालकर देवें । तेल , तिल व अन्नादि व काला नीला वस्त्र का दान करें ।
बाद में गोमुख प्रसव शांति व सूर्यपूजन ( नांवण ) कराकर मूलशांति हेतु हवन प्रारंभ करें । बचे हुये पेड़ों के पत्ते , जल , २७ तरह का अनाज , २७ जगह कि मिट्टी आदि आचार्य पास में रख लेवें ताकि शांति अभिषेक में काम आवे ।
प्रधान हेतु अग्नि वेदी के पूर्व में श्वेत वस्त्र पर चावलों से स्वस्तिक बनायें । हरे रंग हेतु मूंग , लाल रंग हेतु मसूरदाल , काले रंग हेतु उड़द एवं पीले रंग हेतु चने की दाल का प्रयोग करें । अथवा चावलों को रंग लेवें । भध्य में श्वेत पुञ्ज रखें । चारों दिशाओं मे चार एवं मध्य में एक कलश रखें । पूर्व में लाल रंग की रेखा , दक्षिण में काले रंग , पश्चिम में पीले रंग व उत्तर में हरे रंग की रेखा खींचे ।
नक्षत्रों के अधिपति भद्रपीठ हेतु पांच रंगों से , एक अष्टदल बनाकर उसके बाहर २४ दलों का पद्म बनायें एवं उसके बाहर तीन परिधि इन्द्रादिलोकपालों हेतु बनायें ।
अगर प्रधान व नक्षत्रों के अलग – अलग पीठ नहीं बनायें हो तो नक्षत्र भद्रपीठ पर प्रधान का कलश रखें । चारों दिशाओं में चार कलश रखें एवं शतछिद्र कलश प्रधान के पास में रखें । यजमान सत्पनीक पूर्वाभिमुख होकर शुभ आसन पर बैठे ।
ब्राह्मण भद्रसूक्त व शांतिपाठ कर गणपति स्मरण करें ।
संकल्प- ॐ अद्येत्यादि मम अस्य बालकस्य मूल जनन सूचित सर्वारिष्ट निरसन द्वारा जातकस्य नैरुज्यदीर्घायु पुष्टि धन धान्य समृद्धि हेतवे श्री परमेश्वप्रीत्यर्थं स नवग्रहमखां मूलजनन शान्तिं करिष्ये । तदंगभूतं गणपति पूजनं , पुण्याहवाचनं , मातृका पूजनं , वसोर्द्धारा , नान्दीश्राद्धं , ब्राह्मणवरणं , पंचगव्यकरणं , ग्रहमख पूजनसहिते हवनादि कर्म चाहं करिष्ये ।
दिक्रक्षण गणपति पूजन से अग्नि स्थापन पर्यन्त सब कार्य करें । मूलाधिष्ठित प्रधान देव रुद्र है । स्वस्तिक पीठ के मध्य में कलश रखें , उस पर पूर्ण पात्र रखकर रुद्र की मूर्ति अग्न्युत्तारण करके रखें । चार कलश चारों दिशाओं में रखें । चारों के बीच में एक १०० छिद्र का अन्य कलश रखें । ( सभी कलशों में जल , पेड़ों की जड़ें या पत्तियां , पंचगव्य , पंचरत्न , सप्तमृत्तिका , कुशा , सप्तधान्यादि डालें )
मध्य कलश में रुद्र का आवाहन करें- वृषभे च समाशीनं वरदाभयपाणिनम् । शुद्धस्फटिक – संकाशं श्वेतमाल्यांबरान्वितम् ॥
त्र्यंबक मंत्र से आवाहन करें । हाथ जोड़े हे त्र्यंबक महादेव ! त्रायस्व शरणागतम् । जन्ममृत्यु जराव्याधि पीड़ितं कर्म बंधनैः ॥
शिव की पूजा करें । नमस्ते रुद्रमन्यव….. रुद्रसूक्त का पाठ करें । चार ब्राह्मण पूर्वादिक्रम से कलशों का स्पर्श करते हुये क्रमशः शांतिसूक्त , अग्निसूक्त , अथवा जातवेदसूक्त , रुद्रसूक्त , त्र्यंबक मंत्र का जप करें । अग्निसूक्त के अभाव में निम्न मंत्र जपे-
रुद्रतेज समुद्भूतं द्विमूर्धानं द्विनासिकौ । अग्नि वैश्वानरसाक्षात् तस्मै नित्यं नमो नमः ॥
आयुष्यमंत्र के जाप , शिव महिम्न , रुद्रपाठ , शुक्रादि स्तुति पाठ एवं मृत्युंजय मंत्र का जप ब्राह्मण करें ।
सौ छिद्र वाले घट में देवदारु , छलीरा , कमल , वच , लोध , कांगनी , जलद , सफेद सरसों , धात्रीफल , नगर , हल्दी , जटामांसी , पुर उशीर , चंदन व कुष्ठ डालें ।
पश्चात् अष्टदल , चतुर्विंशतिदल एवं भूपूर युक्त भद्रपीठ पर मध्य में एक कलश स्थापित करें , पूर्णपात्र रखें उस पर नैऋति की मूर्ति रखें एवं आवाहन करें कलश में शतौषधी , या २७ औषधी डालें अभाव में विष्णुक्रांता , सहदेवी , तुलसी शतवारी , वच , कुष्ठ , सुष्ठी , चम्पक , एवं मुस्ता डाले । २७ जगह का जल भी डालें । ( पूर्व कलश में रक्त चंदन , कमलकुष्ट , प्रियंगु , शुंठी , मुस्ता आमलक व च सफेद सरसों मुरामांसी अगर उशीर डाले ) नमस्ते रुद्रमन्यव का जप करें ।
दक्षिणकुंभ में पंचामृत , गजमद तीर्थोदक , सप्तधान्य डाल कर ” आशु शिशानादि “ ऋचा पढ़े । पश्चिम कुंभ में सप्तमृत्तिका डाले ‘ कृणुष्वाजः ‘ आदि ५ मंत्र पढ़े । उत्तर कुंभ में पंचरत्न वट , पीपल , पलाश , प्लक्षउदम्बर के पत्ते डालें । आम , जामुन के पत्ते डालें । मध्य कलश में ( या १०० छिद्र वाले कलश में ) शतौषधि डाले अभाव में विष्णु क्रातांदि औषधि डाले )
नक्षत्राधिपति भद्रपीठ पर मूलादि देवों का आवाहन करें ।
मूल देवं विरूपाक्षो श्यामं कुणपवाहनम् । खड्गखेटधरं चोग्रं द्विभुजं च वृकाननम् ॥
आवाहयामि देवेशं मूलदेवं महाबलम् । देवदेव गणाध्यक्षमूलमावाहयाम्यहम् ॥
पश्चात् मूलनक्षत्राधिष्ठित नैर्ऋत्य का आवाहन करें –
असुन्वन्तमयजमानमिच्छस्तेनस्येत्यामान्विहि तस्करस्य । अन्यमस्मदिच्छसात इत्या . नमो देवि निर्ऋते तुभ्यमस्तु ॥ मूल नक्षत्राधिष्ठित निर्ऋते इहा गच्छ इहतिष्ठ ॥१ ॥
फिर देव के दक्षिण याने कर्ता के वाम भाग में मूल नक्षत्र से पूर्व के नक्षत्र जेष्ठाधिपति इन्द्र का आवाहन करें-
ॐ त्रातारमिन्द्र मवितारइन्दग्गुँहवे हवे सुहवः शूरमिन्द्रम् । ह्वयामि शक्रम्पुरुहूतमिन्द्र स्वस्ति नो मघवाधात्विन्द्र ॥ ॐ ज्येष्ठाधिष्ठित इन्द्र इहा ० इहतिष्ठ ॥२ ॥
देवराज गजारूढ पुरंदर शतक्रतो । वज्रहस्त महाबाहो वांछितार्थप्रदोभव ॥
बाद में देव के वाम भाग अर्थात् कर्ता के दक्षिण भाग में मूलनक्षत्र के आगे के नक्षत्र पूर्वाषाढाधिष्ठित वरुण का आवाहन करें ।
ॐ तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भि : । अहेडमानो वरुणे हबोद्ध्युरुशग्गुँसमान आयुः प्रमोषी : ॥
आवाहयामि देवेशं वरुणं त्वं जलाधिपम् । यादः पृष्ठ समारूढं श्वेतच्छत्रं महाबलम् ॥ ॐ पूर्वाषाढाधिष्ठित वरुण इहा ० इह ० ॥३ ॥
अब शेष बचे २४ नक्षत्रों के अधिपतियों के लिये २४ दल के पद्म में आवाहन करें । पूर्वाषाढ़ा के बाद उत्तराषाढ़ा से लेकर अनुराधा के अधिष्ठित देवों का पूर्वादिक्रम से आवाहन करें ।
उत्तराषाढ़ाधिष्ठित विश्वेदेवा इहागच्छ इहतिष्ठ ॥१ ॥
श्रवणाधिष्ठित विष्णो इह ० इहतिष्ठ ॥२॥
धनिष्ठाधिष्ठित अष्टवसवः इहा ० इह ० ॥३ ॥
शतभिषाधिष्ठित वरुण इहा ० इह ॥४॥
पूर्वाभाद्रपदाधिष्ठित अजैकपाद इहा इह ० ॥५ ॥
उत्तराभाद्रपदाधिष्ठित अहिर्बुध्न्य इहा ० इह ० ॥६ ॥
रेवत्यधिष्ठित पूषन् इहा ० इह ० ॥७ ॥
अश्विन्यधिष्ठित अश्विनौ इहा ० इह ० ॥८॥
भरण्यधिष्ठित यम इहा ० इह ० ॥९॥
कृत्तिकाधिष्ठित अग्ने इहा ० इह ०॥१० ॥
रोहिण्यधिष्ठित प्रजापते इहा ० इह ० ॥११ ॥
मृगशीर्षाधिष्ठित सोम इहा ० इह ० ॥१२॥
आर्द्राधिष्ठित रुद्र इहा ० इह०॥१३॥
पुनर्वस्वधिष्ठित अदिते इहा ० इह ० ॥१४ ॥
पुष्याधिष्ठित बृहस्पते इहा ० इह ० ॥१५ ॥
आश्रूषाधिष्ठित सर्प इहा ० इह ० ॥१६ ॥
मघाधिष्ठित पितरः इहा ० इह ० ॥१७॥
पूर्वाफाल्गुन्यधिष्ठित भग इहा ० इह ० ॥१८॥
उत्तराफाल्गुन्यधिष्ठित अर्यमान्निहागच्छ इह तिष्ठ ॥१ ९ ॥
हस्ताधिष्ठित सूर्य इहा ० इह ० ॥२० ॥
चित्राधिष्ठित त्वष्टः इहाइह ० ॥२१ ॥
स्वात्यधिष्ठित वायो इहा ० इह ० ॥२२ ॥
विशाखाधिष्ठितौ इन्द्राग्नी इहागच्छतं इह तिष्ठम् ॥२३ ॥
अनुराधाधिष्ठित मित्र इहा ० इह ० तिष्ठ ॥२४ ॥
परिधि में पूर्वादिक्रम से इन्द्रादि देवों का आवाहन करें ।
पूर्व – इन्द्राय नमः । आग्नेये- अग्नये नमः । दक्षिणे यमाय नमः । निर्ऋत्ये – निर्ऋतिये नमः । पश्चिमे – वरुणाय नमः । वायवे – वायव्ये नमः । उत्तरे- कुबेराय नमः । ऐशान्ये – ईशानाय नमः । इन्द्र ईशानयोमध्ये –ब्रह्मणे नमः । वरुण निर्ऋतियोर्मध्ये – अनंताय नमः ।
भो इन्द्रादि लोकपाल देवेभ्यो सांगायै सपरिवारायै , सवाहनायै ,सायुधायै इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ मनोजूति ० मंत्र से प्रतिष्ठा करें ।
एह्ये हि रक्षोगण नायकत्वं विशाल वैताल पिशाच संधैः । ममाध्वरं पाहि पिशाचनाथ लोकेश्वरस्तं भगवन नमस्ते ॥ ॐ निर्ऋत्याद्यावाहित देवेभ्यो नमः ।
सब देवताओं का षोडशोपचार पूजन करें । दधि , दूर्वा , कुंकुम , अक्षत , सुपारी , कुशा , एवं जल एक पात्र में डालकर अर्घ देवें ।
अयोने भगवन् भर्गलाला स्वेदाश्च संभवः । गृहाणार्घ्यं मयादत्तं मूलस्वामिन् नमोऽस्तुते ॥
प्रार्थना करें – सर्व प्रेताधिपो देवो नैऋत्यो नील विग्रहः । खड्गचर्मधरो देवो नैर्ऋत्याधिपतये नमः ॥
नवग्रह पीठ पर नवग्रहों एवं अधिदेवता प्रत्यधि देवों का पूजन करें , हवनादिकर्म करें ।
पश्चात् -प्रजापते स्वाहा । इदंप्रजापते न मम ॥ इन्द्राय स्वाहा । इदं इन्द्राय न मम । अग्नये स्वाहा । इदं अग्नये न मम । सोमाय स्वाहा । इदं सोमाय न मम ॥ ॐ अग्नि स्विष्टकृते स्वाहा । इदं स्विष्टकृते न मम ॥
फिर अग्नि का पूजन करें – ॐ शांति के वरदनाम्ने वैश्वानराय नमः ॥ समिद् , पायस , घृत , तिलादि से ग्रह होम , अधिदेवता प्रत्याधिदेवता एवं प्रधान हेतु होम करें ।
ब्राह्मण आयुष्य मंत्रों का पठन मृत्युञ्जयजप , शांतिसूक्त , रुद्रसूक्त पाठ करते रहें ।
मूल नक्षत्र हेतु निम्न मंत्र से १०८ आहुति देवें –
ॐ मातेवं पुत्रं पृथिवी पुरीष्यमग्निग्गुँस्वेयोनावभारुषा । तां विश्वैर्दैवैर्ऋतुभिः संविदानः प्रजापति विश्वकर्मा विमुञ्चतु ॥ ॐ मूलाय स्वाहा । इदं मूलाय न मम ॥
इसके बाद ८ आहुति मंत्रोक्त देकर बाद में ” ॐ मूलाय स्वाहा “ नाम मन्त्र से दे सकते है ।
पश्चात्- ” ॐ निर्ऋतये स्वाहा “ की १०८ आहुतियाँ , इन्द्राय स्वाहा की २८ आहुतियां , वरुणाय स्वाहा की २८ आहुतियां देवें ।
शेष २४ नक्षत्राधिष्ठित देवों की प्रत्येक की ८-८ आहुतियां देवें । पूर्वाषाढा से लेकर अनुराधाष्ठित देवों की नामावलि में प्रारंभ में ॐ जोड़ कर तथा अंत में स्वाहा बोलकर घृत पायस तिलादि से होम करें । यथा –
ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा । विष्णवे .। वसुभ्य .। वरुणाय .। अजैकपदे .। अहिर्बुध्नाय .। पूष्णे .। अश्विभ्यां .। यमाय .। अग्नये .। प्रजापतय .। सोमाय.।रुद्राय.।अदितये .। बृहस्पतये .। सर्पाय .। पितृभ्य .। भगाय .। अर्यम्णे .। सवित्रे . । त्वष्ट्रे .। वायवे .। इन्द्राग्निभ्यां .। मित्राय .।
इन्द्रादि दश लोकपालों हेतु प्रतिद्रव्य एक आहुति देवें । यथा –
ॐ इन्द्राय स्वाहा .। अग्नये .। यमाय .। निर्ऋतये .। वरुणाय .। वायवे .। सोमाय .। ईशानाय .। ब्रह्मणे .। अनन्ताय .।
पश्चात् कृशरपायस याने खीर मावा में तिल , घृत , शक्कर डालकर प्रत्येक देवता हेतु ८-८ आहुतियां देवें ।
ॐ निर्ऋतये स्वाहा । सवित्रे . । दुर्गायै .। वास्तोष्पतये .। अग्नये .। क्षेत्राधिपतये .। मित्रावरुणाभ्यां .। रुद्राय .।
श्री : हेतु समिद आज्य व चरु द्रव्य से होम करें । ‘ ॐ श्रिये स्वाहा । ‘
सोम के लिये पायस द्रव्य से १३ आहुतियां देवें । यथा- ॐ सोमाय स्वाहा स्रुव से शुचि को घी से भरकर एक आहुति देवें ॐ रुद्राय स्वाहा ।
श्रीसूक्त से लक्ष्मी होम करें । गुगल से मृत्युजय व दुर्गा होम करें । रोग व शत्रुनाश हेतु सरसों से होम करें ।
प्रायश्चित् होमः – ॐ भूर्भुवः स्वः इत्यादि व्याहृतियों २८ आहुति देवें ।
ॐ भूःस्वाहा । ॐ भुवः स्वाहा । ॐ स्वः स्वाहा । ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा । इनकी ७ आवृत्ति करने पर २८ आहुति हो जायेगी ।
मृडनाम्ने वैश्वानराय नमः से अग्नि का पूजन करें ।
अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । इदमग्नये से स्विष्टकृते न मम ॥ फिर ९ आहुतियाँ देकर दिक्पालों की बलि देवें । यथा-
भूः स्वाहा इदं अग्नये न मम ॥ से प्रारंभ कर प्रजापतये स्वाहा तक ९ आहुतियां देवें । ( मंत्र गोमुख प्रसव शांति में पूर्णाहुति समय दिये है )
अग्नि वेदी के चारों ओर दशों दिशाओं में इन्द्रादि दिक्पालों हेतु बलि प्रदान करें । दिशाओं के देवों का आवाहन करें , बलि का पूजन करें । बलि एवं नैवेद्य अर्पण करें ।
इन्द्रादि दिग्पालेभ्यः सांगाय ,सपरिवाराय सायुधं इमान् समाष बलि सदीप नैवेद्यं समर्पयामि ।
भो इन्द्रादि दिग्पाला दिशो रक्ष बलिं भक्षय मम सपरिवारस्य आयुकर्ता क्षेमकर्ता , तुष्टिकर्ता पुष्टिकर्ता कल्याण कर्ता वरदो भवतः ।
इसके बाद पूर्णाहुति होम कर संस्रुवप्राशन कराये । पूर्ण पात्रादि दान कराये । प्रणिता को ईशान कोण में उल्टी करें ।
टिप्पणी : – बहुत से प्रांतों में इस समय गोमुख प्रसव हेतु गोमुखाकार सरकंडों या मोली में बालक को ३ या ७ बार निकालते हैं , काले मटके में १३ किलो या २७ किलो अनाज भरकर १३ मीटर या २७ हाथ वस्त्र में लपेटकर यजमान उस का मूसल से छेदन कंसवध की भावना रखते हुये करते हैं । वह अनाज , वस्त्र विप्र को दान देवें । इसके पश्चात २७ कुओं के जल व पत्तों से जातक व माता – पिता का अभिषेक करते हैं । गोमुख प्रसव की भावना इस समय की है अत : नांवण भी इसके बाद करते है । परन्तु यह मूल सिद्धान्त से भिन्न है गोमुख प्रसव व अन्न दान होम से पहिले करा ले । अन्नदान हवन बाद भी किया जा सकता है ।
अभिषेक – शतछिद्र या सहस्रछिद्र वाला कलश लेवें उसमें औषधियां रखे , २७ तरह का अनाज व मृत्तिका डालें । पत्नि को वाम भाग में बिठावे बालक को माता गोद में लेवें । एक कंबल यजमान दंपत्ति एवं बालक पर आच्छादित करें । शतछिद्र कलश में पंचगव्य , गंगाजल डालें । २७ जगह का जल जो पूजन के कलशों में भरा था सब संग्रहीत कर शतछिद्र कलश में डालते हुये मूलदोष नाश हेतु अभिषेक मंत्र पढ़े ।
” आपोहिष्ठा मयोभुवान . ” तीनों ऋचायें बोलें । इसके बाद पौराणिक मंत्रों से अभिषेक करें ।
॥ मूल दोषशान्ति मन्त्राः ॥
योऽसौ वज्रधरो देवो महेन्द्रो गजवाहन : । मूलजातं शिशोर्दोषं मातापित्रोर्व्यपोहतु ॥१ ॥
योऽसौ शक्तिधरो देवो हुतभुङ् मेषवाहनः । सप्तजिह्वश्चदेवोऽग्निर्मूलदोषं व्यपोहतु ॥२ ॥
योऽसौ दंडधरो देवो धर्मो महिषवाहनः । मूलजातं शिशोर्दोष व्यपोहतु यमो मम ॥३ ॥
योऽसौ खड्गधरो देवो निर्ऋती राक्षसाधिपः । प्रशामयतु मूलोत्थं दोषं गंड़ान्तसंभवम् ॥४ ॥
योऽसौ पाशधरो देवो वरुणश्च जलेश्वरः । नक्रवाहः प्रचेतानो मूलदोषं व्यपोहतु ॥५ ॥
योऽसौ देवो जगत्प्राणो मारुतो मृगवाहनः । प्रशामयतु मूलोत्थं दोषं बालस्य शान्तिदः ॥६ ॥
योऽसौ निधिपतिर्देवः खङ्गभृद्वाजिवाहनः । मातापित्रोः शिशोश्चैव मूलदोषं व्यपोहतु ॥७ ॥
योऽसौ पशुपतिर्देवः पिनाकी वृषवाहनः । मूलादिसर्वगंडान्तं दोषमाशु व्यपोहतु ॥८ ॥
विघ्नेशः क्षेत्रपो दुर्गा लोकपाला नवग्रहाः । सर्वदोषप्रशमनं सर्वे कुर्वन्तु शान्तिदाः ॥९ ॥
मूलनक्षत्रजातस्य मातापित्रोर्धनस्य च । भ्रातृज्ञातिकुलोत्थानां दोषं सर्वं व्यपोहतु ॥१० ॥
पितरः सर्वभूतानां रक्षन्तु पितरः सदा । मूलनक्षत्रजातस्य वित्तं च ज्ञातिबांधवान् ॥११ ॥
दोष शांति के मंत्रों के बाद आशीर्वादात्मक एवं रक्षात्मक मंत्रों से अभिषेक करें ।
॥ अभिषेक मन्त्राः ॥
सुरास्त्वामभिषिंचन्तु ब्रह्म विष्णु महेश्वराः । वासुदेवोजगन्नाथस्तथा संकर्षणो विभुः ॥१ ॥
प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु विजयाय ते । आखण्डलोऽग्निर्भगवान् यमौ वै निर्ऋतिस्तथा ॥२॥
वरुणः पवनश्चैव धनाध्यक्षस्तथा शिवः । ब्रह्मणाऽनन्तसहिता दिक्पालाः पान्तु ते सदा ॥३ ॥
कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृर्तिर्मेधा पुष्टिःश्रद्धा क्रिया मतिः । बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिस्तुष्टिः कान्तिश्च मातरः ॥ एतास्त्वामभिषिंचन्तु देवपत्न्यः समागताः ॥४ ॥
आदित्यश्चन्द्रमा भौमो बुध जीवसितार्कजाः । ग्रहास्त्वामभिषिचन्तु राहुकेतुश्च तर्पिताः ॥५ ॥
ऋषयो मुनयो गावो देवमातर एव च । देवपत्न्यो द्रुमानागा दैत्याश्चाप्सरसां गणाः ॥६ ॥
अस्त्राणि सर्वशस्त्राणि राजानो वाहनानि च । औषधानि च रत्नानि कालस्यावयवाश्च ये ॥७ ॥
सरितः सागराः शैलस्तीर्थानि जलदानदाः । एते त्वामभिषिंचन्तु सर्व कामार्थसिद्धये ॥८ ॥
सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम् । तेन त्वामभिषिंचामि पावमान्यः पुनन्तु ते ॥९ ॥
भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्येः बृहस्पतिः । भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो दधुः ॥१० ॥
यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यश्चमूर्धनि । ललाटे कर्णयोरक्ष्णो रापो निघ्नन्तु ते सदा ॥११ ॥
छायापात्र दानम् – कांसी के पात्र में घृत व तैल डालें जातक एवं माता पिता उसमें अपने मुख का अवलोकन कर सदक्षिणा विप्र को दान करें । अन्नदान तिलदान वस्त्रदान कर ब्राह्मण भोजन करायें ।
॥ इति मूलशांति प्रयोगः ॥
