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अथ चौलसंस्कार प्रयोग

अथ चौलसंस्कार प्रयोग

पिता शुभ दिन जातक का संस्कार अपनी कुलदेवी या कुलदेवता के यहाँ करें ।

प्रायश्चित सङ्कल्प- मम सुतस्य चौलसंस्कारस्य स्वकालातिक्रमदोष प्रत्यवायपरिहारार्थं अर्धकृच्छरूपं प्रायश्चितं रजतप्रत्याम्नाय द्वारा अहमाचकरिष्ये ॥

अनेन अर्धकृच्छरूपप्रायश्चित्तकृतेन मम अमुक शर्मणः सुतस्य चौल संस्कार कर्मण्यधिकार सिद्धिरस्तु ।

पुन : – अद्येत्यादि …… । बोलकर ३ ब्राह्मण भोजन का संकल्प चौलसंस्कार अधिकार सिद्धि हेतु करें ।

पश्चात् पूजन हेतु सङ्कल्प करें

अद्येत्यादि ….. मम सुतस्य बीजगर्भ समुद्भवैनो निबर्हणेन बलायुर्व ! भिवृद्धि द्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं चौलसंस्काराख्यं कर्म करिष्ये । तत्रादौ निर्विघ्नता सिद्ध्यर्थं श्रीमहागणपतेः पंचोपचारैः पूजनं करिष्ये ।

गणपत्यादि पूजन करें- शीतोदक , उष्णोदक , नवनीत पिण्ड , घृतपिण्ड , दधिपिण्ड , गोमयपिण्ड , तीन शल्ली , २७ कुशायें । प्रणिता प्रोक्षणी लाल या श्वेत वस्त्र इत्यादि वस्तुऐं संग्रहीत करें । वेदी बनाकर पंचभूसंस्कार कर अग्नि स्थापन कर प्रजापत्यादि की आहुति देकर अग्नि का पूजन करें ।

” ॐ सभ्यनाम्ने वैश्वानराय नमः “ । कुलदेवता की ८ या २८ आहुतियाँ देकर स्विष्टकृत होम करें । भूः , भुवः , स्वः , तथा त्वन्नो अग्नि इत्यादि ( अग्नि की ५ आहुतियाँ ) देकर ” प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापते न मम ‘ से होम समापन करें । इन ९ आहुति देने के बाद संस्रवप्राशन पूर्णपात्र का दान करायें ।

शीतोष्ण जल पास में रखें । केशान्त संस्कार करते समय नाई शिर के दक्षिण भाग , पश्चात् पश्चिम भाग फिर उत्तर भाग का वपन करें ।

अलग – अलग भाग हेतु अलग – अलग गोदान का संकल्प करें । यथा

दक्षिण गोदानम्- ॐ अद्येत्यादि – अस्य कुमारस्य चूडाकर्म – कर्तुम धिकारार्थं दक्षिणगोदानं मुण्डनं च करिष्ये ।

शीतोष्ण जल से केशों का आसिंचन करें । ॐ उष्णेन वायउदकेने ह्यदिते केशान्वप ॥ नवनीत घृत व दधिपिण्ड का प्रासन करायें ।

केशों को कंघी से उठाकर ऊँचा करें- ॐ सवित्रा प्रसूता दैव्या आप उन्दन्तु ते तनूम् । दीर्घायुत्वाय वर्चसे ॥

तीन कुशायें केशों में रखें ॐ ओषधेत्रायस्व एवं केशों को नापित अस्त्र से हटाये । लोहे का उस्तरा इस मंत्र से चलावें ॐ शिवोनामासि स्वधितिस्तेपिता नमस्ते अस्तु मामाहि ग्गुँ सीः ।

इस मंत्र से केश , कुशा एवं अस्त्र का संलग्नीकरण करें । निवर्त्तयाम्यायुषेन्नाद्य यप्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय ॥

इसके बाद छेदन करें- ॐ येनावपत्सविता क्षुरेण सोमस्यराज्ञो वरुणस्य विद्वान् । तेन ब्रह्मणोवपते दमस्यायुष्यं जरदष्टिर्यथासम् ॥

केशों व कुश तरुण को गोमय पिण्ड में अग्नि के उत्तर में रखें । दो बार बिना कुछ कहे यही क्रिया करके केश व कुशों को गोमय पिण्ड में रखें ।

पश्चिम गोदानम्- हस्ते जलमादाय ….. अस्य कुमारस्य चूडाकर्म कर्तुमधिकारार्थं पश्चिम गोदानं मुण्डनं च करिष्ये ।

पहले की तरह मंत्रादि पठन व कर्म करें ।

केशों को उठाते समय इस मंत्र को कहें – ॐ सवित्रा प्रसूता दैव्या आप उन्दन्तु ते तनूम् । दीर्घायुत्वाय बलाय वर्चसे ।

त्रेणी शल्य से केशों को हटाये , तीन कुश तरुण अन्दर रखें- ॐ ओषधेत्रायस्व मंत्र से ।

लोहक्षुर शिर पर रखें ॐ शिवोनामासि स्वधिस्ते पिता नमस्ते अस्तु मामाहि ग्गुँ सीः ।

त्र्यायुष मंत्र से केश छेदन करें । ॐ त्र्यायुषञ्जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषुत्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् ॥

इस तरह २ बार बिना मंत्र के करें केश व कुशतरणों को गोमय पिण्ड में रखें ।

उत्तर गोदानम्- हस्ते जलमादाय अस्य कुमारस्य चूडाकर्म कर्तुम धिकारार्थमुत्तर गोदानं मुण्डनं च करिष्ये ।

पहिले की तरह ” ॐ सवित्रा प्रसूता ‘ ‘ मंत्र से केशों को ऊँचा करें । ” ओषधेत्रायस्व ‘ मंत्र से कुशतरुण रखें एवं ” शिवोनामासि ‘ ‘ मंत्र से क्षुरिका शिर पर रखें पश्चात् केश छेदन करें ।मंत्र- येन भूरिश्चरादि वज्ज्योक्चपश्चाद्धि सूर्यम् । तेनतेवपामि ब्रह्मणा जीवा तवे जीवनायसु श्लोक्याय स्वस्तये ॥

केशों व कुश तरुणों को गोमय पिण्ड में रखें । पुन : चुपचाप इस तरह को दो बार करें ।

पश्चात् ३ बार शिर की प्रदक्षिण क्रम से क्षुरिका से वपन करें । ॐ यत्क्षुरेण मज्जयतासु पेशसावप्तावा वपति । केशाञ्छिन्धि शिरोमास्यायुः प्रमोषीः ॥

इसके बाद शिर को गीला करें । क्षुरिका नापित को देवें ।

पिता कहें- ॐ अक्षुण्वन्परिवप । नाई कहे- वपामीति ॥

कुमार का मुँह पूर्व की तरफ करके शेष केशों का वपन करें । केशों का अपने कुलदेवता की रीति अनुसार अर्पण करें । अथवा गोमय पिण्ड में रखें उनको वस्त्र में लपेट कर जल मध्य या गोशाला अथवा अज्ञात स्थान पर रख देवें ।

कुमार को स्नान कराकर , नूतन वस्त्र धारण करायें । मस्तक पर हल्दी से स्वस्तिक बनायें , तिलक करें कुल देवता के समक्ष जाकर पूजा नमस्कार करें । कर्म को श्रीकर्माङ्गदेवता के अर्पण करें ।

॥ इति चौलसंस्कार प्रयोगः ॥