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अथ गर्भाधान संस्कार

अथ गर्भाधान संस्कार

प्रथम गर्भ के समय गर्भाधान पुंसवन व सीमान्त पूजन करना चाहिये ।

गर्भाधान सीमन्तोन्नयने तु स्त्री संस्कारत्वात्प्रतिगर्भ – नावर्तेते किन्तु प्रथमगर्भे एष कार्ये ।

गर्भाधान हेतु ऋतुकाल के ६ दिन छोड़कर शुभ दिन में संस्कार करें , कर्ता पूजन हेतु संकल्प करें ।

सङ्कल्प – देशकालौ सङ्कीर्त्य अस्या मम भार्यायाः प्रथम गर्भातिशय द्वारा जनिष्यमाण सर्वगर्भाणां बीजगर्भसमुद्भववैनो- निबर्हणार्थं गर्भाधान संस्काराख्यं कर्माहं करिष्ये तत् अंगत्वेन गणपति पूजनं स्वस्ति पुण्याह वाचनं मातृका पूजनं नान्दीश्राद्धं च करिष्ये ।

कर्म के अभाव में सूर्य दर्शन व गायत्री मंत्र का जप करें ।

ॐ आदित्यङ्गर्भ – पयसा समङ्धि सहस्रस्यप्रतिमां विश्वरूपम् । परिवृऽधिहरसामाभिम ग्गुँ स्थाः शतायु पऽकृणुहिचायमानः । इस मंत्र से सूर्य नमस्कार करें ।

रात्रि समय पति पत्नि सुसंस्कारों को धारण करें शयनागार में प्रवेश करें । भर्ता स्त्री के नाभि प्रदेश पर हाथ रखकर ब्रह्मा व गायत्री से सृष्टि हेतु गर्भाधान का आशीर्वाद प्राप्त करें ।

ॐ पूषाभगः सविता मे ददातु रुद्रः कल्पयतुललामगुम् । विष्णुर्योनि निङ्कल्पयतु त्वष्टारूपाणिपिः र्ठ शतु । आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भन्दधातु ते ॥ गर्भधेहि सिनीवालि गर्भधेहि पृथुष्टके । गर्भन्तेऽअश्विनौ देवा वाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥

तेजो वैश्वानरो दद्यात्॥अथ ब्रह्मानुमंत्रयते । ब्रह्मागर्भदधातुते । अथाभिगमन्- भर्ता पत्नि से अभिगमन करें ।

गायत्रेणत्वाच्छंद सामन्थामित्रैष्टुभेन त्वाच्छन्द सामन्थामिजागतेन त्वाच्छन्द सामन्थापि ॥

रेतोमूत्रं विजहातियोनिं प्रविशादीन्द्रियम्।गर्भोजरायुणावृत उल्बञ्जहाति जन्मना । ऋतेन सत्यं इन्द्रियं विपान ग्गुँ शुक्रमन्ध स इन्द्रस्येन्द्रियमिदम् पयोमृतम्मधु ॥

अभिगमनांतर भार्या के दक्षिणस्कंध पर हाथ रखकर पुनः अपने हृदय का आलंभन करें ।

ॐ यत्ते सुसीमेहृदयन्दिवि चन्द्रमसिश्रितम् । वेदाहन्तन्मान्तद्विद्यात्पश्येम शरदः शतञ्जीवेम शरदः शतः शृणुयाम शरदः शतम् ॥

पश्चात् प्रात : काल शुचि होकर ब्राह्मण भोजन करायें । मातृगणों का विसर्जन करें । कर्मफल को भगवान नारायण को अर्पित करें । यथा ( तेन श्रीकर्माङ्ग देवताः प्रीयन्ताम् ) ।

आजकल इस संस्कार का लोप हो गया है अत : गर्भ रक्षा हेतु गर्भाधान पश्चात् शुभ दिन १०८ गायत्री मंत्र व महामृत्युञ्जय की आहुतियाँ देनी चाहिये ।

॥प्रतिमास पूजनम्॥

गर्भ रक्षा हेतु प्रतिमास अलग – अलग देवताओं के पूजन हेतु कहा गया है मासे मासे पूजये दशवे मास प्रसूतवे ।

गर्भाधान से दशवें मास तक प्रत्येक माह के स्वामि इस प्रकार है ।

शुक्र , मंगल , गुरु , सूर्य , चन्द्र , शनि , बुध आधान लग्नेश , चन्द्र तथा सूर्य होते है । अत : इनका पूजन प्रतिमाह करें । आधान लग्न अर्थात् गर्भधारण काल का लग्नेश । इसका अनुमान पूर्ण होने पर गर्भिणी की जन्म कुण्डली के पंचम भाव के स्वामी का पूजन किया जा सकता है ।