
अथ ज्येष्ठाशांति प्रयोग
मूलशांति की तरह ही पहले गोमुख प्रसव शांति करायें । स्वस्तिक पीठ बनाकर उसके चारों और चार कलश तथा मध्य में शतछिद्र वाला कलश रखे उनमें पंचगव्य , गंगाजल , सप्तमृत्तिका शतौषधि व सप्तधान्यादि का प्रक्षेप करे १३ या २७ जगह का लाया गया जल डालें ।
नक्षत्र अधिष्ठित देवताओं के लिये अष्टदल एवं २४ दल का पद्म परिधि युक्त बनायें ।
संकल्पादि कर गणेशपूजन पुण्याहवाचनादि कर वेदी पर अग्नि स्थापन करायें । नक्षत्र अधिष्ठित पीठ पर कलश रखे पूर्ण पात्र रखें उस पर इन्द्र की मूर्ति रखें । इन्द्र का आवाहन करें । अगर इन्द्र मूर्ति स्वास्तिक पीठ पर रखते हैं , तो शतछिद्र कलश नक्षत्र पीठ पर रखें ।
ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिंद्रग्गुँहवे हवे सुहवग्गुँ शूरमिंद्रम् । ह्वयामि शक्रम्पुरुहूतमिंद्रग्गुँस्वतिनो मघवाधात्विंद्रः ॥
वज्रांकुशधरं देव मैरावतगजानिवत् । आगच्छ भगवनिंद्र स्थानेचात्र स्थिरोभव ॥
वहीं ज्येष्ठा नक्षत्र का आवाहन करें –
ॐ स इषुहस्तैः सतिषङ्गिभिर्वशीसग्गुँस्रष्टासयुध इन्द्रोगणेन । स ग्गुँ सृष्टजित्सोमपा बाहुशद्धघुग्रधन्वा प्रति हिताभिरस्ता ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः जेष्ठे इहागच्छेहतिष्ठ ॥
कलश के दक्षिण भाग में – ॐ अनुराधाधिष्ठित मित्र इहा . इह तिष्ठ ॥
कलश के वाम भाग में – ॐ मूलाधिष्ठित निर्ऋत्ते इहागच्छ इह तिष्ठ ॥
चतुर्विंशति दल में पूर्वादि क्रम से – पूर्वाषाढाधिष्ठित वरुण इहा . इह तिष्ठ से प्रारंभ कर विशाखाधिष्ठितौ इद्राग्नी इहागच्छतम् इह तिष्ठतम् तक का आवाहन मूलशांतिवत् करें ।
पीठ देवों का पूजन कर इन्द्र का अर्घ देवें ।
नमस्ते सुरनाथाय नमस्तुभ्यं शचीपते । गृहाणार्घ्यं मयादत्तं गण्डदोष प्रशान्तये ॥
स्वस्तिपीठ पर मध्य कलश में तत्वायामि ब्रह्मणा मंत्र से आवाहन करें ।
पूर्व कलशे ॐ त्वंनो अग्ने तव देव पायुभिर्मघानो रक्षतन्वश्ववंद्य । त्राता तोक कस्य तनये गवामस्य निमेषऽरक्षमाणस्तव व्रते ॥
दक्षिण कलशे – ॐ सत्वन्नो अग्नेवमो भवोती नेदिष्ठोअस्या उषसो व्युष्टौ । अवयक्ष्वनो वरुणग्गुँरराणो वीहि मृडीकग्गुँसुहवो न एधि ॥
पश्चिम कलशे – समुद्रोसिनभया समुद्र ज्येष्ठा मंत्र से आवाहन करें । अथवा – समुद्रादूर्मिर्मधुमाँग्गुँदारदुवाऽशुनासममृतत्व मानट् । घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानामृतस्य नाभिः ॥
उत्तर कलशे इमंमे गंगे यमुने सरस्वति शुतुद्रिस्तोमं स च तापरुष्ण्या । असिकन्या मरुद्वृधे वितस्तया कीये शृणुहयासुषोमया ॥
वरुण मंत्रों से प्रतिष्ठित कर सब कलशों का पूजन करें । ब्राह्मण शांतिसूक्त , अग्निसूक्त , रुद्रसूक्त का पाठ करें । मृत्युञ्जय मंत्र का जप करें ।
पश्चात्- ग्रह पूजन होम अभिषेकादि समस्त कर्म मूलशांतिवत् करें । इन्द्र मंत्र एवं ज्येष्ठा मंत्र की १०८ आहुति देवें । मित्राय स्वाहा एवं निर्ऋतये स्वाहा की २८ आहुति देवें । बाकी जो २४ दल पद्म के देवता है उनकी ८-८ आहुति एवं दिक्पालों की १-१ आहुति देकर शेष कार्य मूलशांतिवत् करें । अभिषेक श्लोकों में मूलदोषं व्यपोहतु की जगह ‘ ज्येष्ठादोषं व्यपोहतु ‘ कहें ।
॥ इति ज्येष्ठा शांति प्रयोगः ॥
