Back

Ekadashi Vrat

Ekadashi Vrat Introduction

व्रत एवं उपवास का महत्व हर देश में हैं। प्रत्येक धर्म व्रत के लिए आज्ञा देता है, क्योंकि इसका विधान आत्मा और मन की शुद्धि के लिए हैं। व्रत या उपवास करने से ज्ञानशक्ति में वृद्धि होती है तथा सद्विचारों की शक्ति प्राप्त होती हैं।

व्रत एवं उपवास में निषेध आहार का त्याग एवं सात्विक आहार का विधान हैं, इसलिए व्रत एवं उपवास आरोग्य एवं दीर्घ जीवन की प्राप्ति के उत्तम साधन हैं। जो व्यक्ति नियमित व्रत एवं उपवास करते हैं, उन्हें उत्तम स्वास्थ्य तथा दीर्घ जीवन की प्राप्ति के साथ-साथ इस लोक में सुख तथा ईश्वर के चरणों में स्थान मिलता हैं।

नारद पुराण में व्रतों का माहात्म्य बताते हुए लिखा गया है कि – गंगा के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं, भगवान विष्णु जैसा कोई देवता नहीं तथा व्रत एवं उपवास जैसा कोई तप नहीं। व्रतों में एकादशी व्रत को सर्वोपरि माना गया है। प्रत्येक मास में दो एकादशी होती हैं। अधिक या लौंद मास पड़ने पर उस मास की दो अन्य एकादशी और होती हैं।

इस प्रकार कुल छब्बीस (26) एकादशियाँ हैं। ये सभी एकादशियाँ अपने नाम के अनुरूप फल देने वाली हैं, जिनकी कथा तथा विधि सुनने से सब भली प्रकार ज्ञात हो जाता है। एकादशी की उत्पत्ति तथा माहात्म्य के पढ़ने और सुनने तथा भजन-कीर्तन करने से मनुष्य सुखों को प्राप्त कर अन्त में विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

एकादशी व्रत के दो भेद हैं – नित्य और काम्य। यदि एकादशी का व्रत बिना किसी फल की इच्छा से किया जाए तो वह ‘नित्य’ कहलाता है। और यदि किसी प्रकार के फल की इच्छा जैसे- धन, पुत्र आदि की प्राप्ति अथवा रोग, दोष, क्लेश आदि से मुक्ति के लिए किया जाए तो वह ‘काम्य’ कहलाता है।

Ekadashi Vrat Vidhi Vidhan

एकादशी व्रत करने वाले स्त्री-पुरुष को दशमी वाले दिन मांस, प्याज तथा मसूर की दाल आदि का सेवन कदापि नहीं करना चाहिए। एकादशी वाले दिन प्रातः पेड़ से तोड़ी हुई लकड़ी की दातुन नहीं करनी चाहिए। इसके स्थान पर नीबू, जामुन या आम के पत्तों को चबाकर मुख शुद्ध कर लेना चाहिए। उंगली से कंठ शुद्ध करना चाहिए।

इस दिन ध्यान रखें वृक्ष से पत्ता तोड़ना वर्जित है, अतः स्वयं गिरे हुए पत्तो का ही उपयोग करें। पत्ते उपलब्ध न होने पर बारह बार शुद्ध जल से कुल्ले कर मुख शुद्धि करनी चाहिए।

फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर, गीता-पाठ करना चाहिए या पुरोहितादि से सुनना चाहिए। भगवान के सम्मुख इस प्रकार प्रण करना चाहिए – ‘आज मैं दुराचारी, चोर व पाखंडी व्यक्ति से बात-व्यवहार नहीं करूंगा। किसी से कड़वी बात कर उसका दिल नहीं दुखाऊंगा। गाय, ब्राह्मण आदि को फलाहार व अन्नादि देकर प्रसन्न करूंगा।

रात्रि जागरण कर कीर्तन करूंगा। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादश अक्षर मंत्र का जाप करूंगा। राम, कृष्ण इत्यादि ‘विष्णु सहस्रनाम’ को कंठ का आभूषण बनाऊंगा।’

इस प्रकार प्रण करने के बाद श्रीहरि भगवान विष्णु का स्मरण कर प्रार्थना करनी चाहिए – ‘हे तीनों लोकों के स्वामी! मेरे प्रण की रक्षा करना। मेरी लाज आपके हाथ है, अतः इस प्रण को पूरा कर सकूं, ऐसी शक्ति मुझे देना प्रभु!’

यदि अज्ञानवश किसी निंदक से बात कर बैठें तो इस दोष के निवारण के लिए भगवान सूर्य नारायण के दर्शन करके, धूप-दीप से श्रीहरि की पूजा-अर्चना कर क्षमा मांग लें।

इस दिन घर में झाडू नहीं लगानी चाहिए, चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का डर रहता है। एकादशी के दिन बाल नहीं कटवाने चाहिए और न ही ज्यादा बोलना चाहिए। ज्यादा बोलने से न बोलने योग्य वचन भी मुख से निकल जाते हैं। एकादशी वाले दिन यथाशक्ति अन्न दान करना चाहिए, परंतु स्वयं किसी का दिया अन्न हुआ कदापि न लें। असत्य वचन व कपटादि कुकर्मों से दूर रहना चाहिए।

दशमी के साथ मिली हुई एकादशी वृद्ध मानी गई है, शिव उपासक तो इसको मान लेते हैं, परंतु वैष्णव योग्य द्वादशी से मिली हुई एकादशी का ही व्रत करें और त्रयोदशी आने से पूर्व व्रत का पारण कर लें। फलाहारी को गोभी, गाजर, शलजम, पालक, कुलफा का साग इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए, बल्कि आम, अंगूर, केला, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करना चाहिए। जो भी फलाहार लें, भगवान को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, दक्षिणादि देकर प्रसन्न कर परिक्रमा लेनी चाहिए। किसी सम्बंधी की मृत्यु होने पर उस दिन एकादशी व्रत रखकर उसका फल उसे संकल्प कर देना चाहिए और श्री गंगाजी में पुष्प (अस्थि) प्रवाह करने पर भी एकादशी व्रत रखकर फल प्राणी के निमित्त दे देना चाहिए।

प्राणी मात्र को प्रभु का अवतार समझकर किसी प्रकार का छल-कपट नहीं करना चाहिए। मीठे वचन बोलने चाहिए। अपना अपमान करने या कड़वे शब्द बोलने वाले को भी आशीर्वाद देना चाहिए। किसी भी प्रकार क्रोध नहीं करना चाहिए। क्रोध चाण्डाल का रूप होता है। देव रूप हो संतोष कर लेना चाहिए।

संतोष का फल हमेशा मीठा होता है। सत्य वचन बोलने चाहिए तथा मन में दया भाव रखना चाहिए। इस विधि से व्रत करने वाला मनुष्य दिव्य फल को प्राप्त करता है।

Ekadashi Vrat Puja Samagri

Following items, which are needed during Ekadashi Vrat Puja, should be collected before Ekadashi Vrat. This list doesn’t include daily Puja items but it lists only those items which are needed especially for Ekadashi Vrat Puja.

  1. फूल माला, फूल-गुलाब की पंखुड़ियां, दूब, आम के पत्ते
  2. कुशा, तुलसी, रोली, मौली, धूपबत्ती, केसर, कपूर
  3. सिंदूर, चंदन, प्रसाद में पेड़ा, बताशा, ऋतुफल, केला
  4. पान, सुपारी, रूई, गंगाजल, अग्निहोत्र भस्म, गोमूत्र
  5. अबीर (गुलाल), अक्षत, अभ्रक, गुलाब जल, धान का लावा
  6. इत्र, शीशा, इलायची, पंजमेवा, हल्दी
  7. पीली सरसों, मेहंदी, नारियल, गोला, पंचपल्लव, बंदनवार
  8. कच्चा सूत, मूंग की दाल, उड़द काले, बिल्वपत्र
  9. पंचरत्न, सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, पंचरंग एवं सर्वतोभद्र के लिए लाल-सफेद वस्त्र
  10. नवग्रह हेतु चौकी, घंटा, शंख, कलश, गंगासागर, कटोरी, थाली, बाल्टी
  11. कड़छी, प्रधान प्रतिमा, पंचपात्र, आचमनी, अर्घा, तष्टा
  12. सुवर्ण शलाका, सिंहासन, छत्र, चंवर, अक्षत, जौ, घी, दियासलाई आदि।

हवन सामग्री में – यज्ञ पात्र व समिधा आदि लें।

If some of the items are not available then Akshata can be used in place of missing item as a remedy.

Ekadashi Vrat Parana

द्वादशी के दिन ब्राह्मण को पहले भोजन कराना चाहिए।

जो ऐसा करने में असमर्थ हों, तो ब्राह्मण भोजन के निमित्त कच्चा सामान (सीधा) मंदिर में या सुपात्र ब्राह्मण को थाली सजाकर देना चाहिए। हरिवासर में भी पारण करना निषेध है।

एकादशी के व्रत करने वाले मनुष्य यदि सब नियमों का पालन कर सकें, तो वह व्रत उन्हें पूर्ण फलदायी सिद्ध होगा।

हेमंत ऋतु में मार्गशीर्ष मास आने पर, कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को इसका उपवास (व्रत) रखना चाहिए। उसकी विधि इस प्रकार है – शुद्ध मन से स्त्री-पुरुष दशमी को सदा एकमुक्त रहें और दिन में एक बार भोजन करें। दिन के आठवें भाग में जब सूर्य का तेज मंद पड़ जाता है, उसे ‘नक्त’ जानना चाहिए। रात को भोजन करना।

‘नक्त’ नहीं है। सभी विवाहित स्त्री-पुरुषों को तारे दिखाई देने पर नक्त भोजन का विधान है और संन्यासियों के लिए दिन के आठवें भाग में अर्थात रात में भोजन का निषेध माना गया है।

Ekadashi Vrat Udyapan

उद्यापन एकादशियों का व्रत करने के पश्चात किया जाता है। बिना उद्यापन किए कोई व्रत सिद्ध नहीं होता, अतः नियमित रूप से एकादशियों का व्रत करने वालों को किसी विद्वान ब्राह्मण की देख-रेख में उद्यापन अवश्य करना चाहिए। एकादशी व्रतों का उद्यापन करते समय विष्णु की विशेष रूप से पूजा-आराधना तो की ही जाती है, हवन भी अनिवार्य रूप से किया जाता है। उद्यापन वाले दिन व्रतधारक को अपने जीवन-साथी सहित स्नानादि करके स्वच्छ, सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा-स्थल को सुंदर रूप से सजाकर और सभी पूजन सामग्री निकट रखकर विष्णु और लक्ष्मीजी की षोडशोपचार आराधना की जाती है। पवित्रीकरण, भूतशुद्धि और शांति पाठ के बाद गणेशपूजन आदि की सभी क्रियाएं की जाती हैं।

एकादशी व्रतोद्यापन पूजा में कलश स्थापना हेतु तांबे के कलश में चावल भरकर रखने का शास्त्रीय विधान है। अष्टदल कमल बनाकर विष्णु और लक्ष्मीजी का ध्यान तथा आह्वान तो किया ही जाता है, कृष्ण, श्रीराम, अग्नि, इन्द्र, प्रजापति, विश्वदेवों, ब्रह्माजी आदि का भी आह्वान किया जाता है। इसके पश्चात मंत्रों का स्तवन करते हुए एक-एक करके भगवान को सभी सेवाएं और वस्तुएं अर्पित की जाती हैं और इसके बाद हवन किया जाता है।

वास्तव में ये सभी कार्य तो पूजन कराने वाला आचार्य अथवा ब्राह्मण ही करता है, आप तो भक्तिपूर्वक पण्डितजी द्वारा बतलाए जाने वाली क्रियाएं ही करेंगे। भगवान की पूजा-आराधना और हवन में कितनी वस्तुओं का और कितनी-कितनी मात्राओं में प्रयोग किया जाए यह पूरी तरह आपकी श्रद्धा और सामर्थ्य पर निर्भर करेगा। शास्त्रीय विधान तो भगवान की स्वर्ण प्रतिमा, स्वर्ण आभूषणों, स्वर्ण सिंहासन, छत्र, चमर, पंचरत्न, दर्जनों मेवों, अनेक प्रकार के अनाजों और फलों आदि के प्रयोग का है, जबकि सभी पूजन सामग्रियों का प्रयोग तो किया जाएगा।

हवन के बाद आचार्य को पूजा में प्रयुक्त सभी वस्तुएं, पांचो कपड़े, जूते, छाता, पांच बर्तन और पलंग सहित सभी बिस्तर तथा धरेलू उपयोग की अनेक वस्तुएं देने का भी शास्त्रीय विधान है। जहां तक व्यावहारिकता का प्रश्न है, कितने ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए और आचार्य एवं अन्य ब्राह्मणों को कौन-कौन सी वस्तुएं दान दी जाएं, इसका महत्त्व तो है ही, मुख्य महत्त्व आपकी भावना और श्रद्धा का है।

Ekadashi Vrat Mahatmya

समस्त पुराणों के व्याख्याकार ब्रह्मज्ञानी श्री सूतजी से एक दिन नैमिषारण्य में शौनक आदि अट्ठासी हजार (88,000) ऋषियों ने एकत्रित होकर प्रार्थना की- “हे परमज्ञानी सूतजी महाराज! कृपा कर एकादशियों की उत्पत्ति तथा उनकी महिमा को बताने की कृपा करें।”

महर्षियों की प्रार्थना सुन सूतजी बोले- “हे परम तपस्वी महर्षियों! अपने पांचवें अश्वमेध यज्ञ के समय धर्मराज युद्धिष्ठिर ने भी भगवान श्रीकृष्ण से यही प्रश्न किया था।

इस पर भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निकला वह सारा वृत्तांत मैं आप सभी को सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो-

एक वर्ष में बारह मास होते हैं और एक मास में दो एकादशी होती हैं, सो एक वर्ष में चौबीस (24) एकादशी हुईं।

जिस वर्ष में अधिक (लौंद) मास पड़ता है, उस वर्ष में दो एकादशी बढ़ जाती हैं।

इन दो एकादशियों को मिलाकर कुल छब्बीस (26) एकादशी होती हैं.