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अथ जातकर्म संस्कार

अथ जातकर्म संस्कार

यावन्न छिद्यते नालं तावन्नाप्नोति सूतकम् । छिन्ने नाले ततः पश्चात् सूतकं तु विधीयते ॥

अर्थात् जब तक जातक का नालच्छेदन नहीं होता तब तक सूतक की प्राप्ति नहीं होती और नालच्छेदन के बाद अशौच की प्राप्ति होती है । जातकर्म संस्कार नाल छेदन के पूर्व किया जाता है । यह संस्कार शीघ्र व स्फूर्ति से किया जाना चाहिये अन्यथा विलंब होने पर जातक को खतरा पैदा हो सकता है । वैसे हॉस्पिटल में पैदा होने वाले जातक के समय में भी यह संभव नहीं है । इसलिये यह संस्कार षष्ठी पूजन के दिन किया जा सकता है । षष्ठी पूजन संस्कार भी जातकर्म संस्कार के अंतर्गत है ।

यजमान संकल्प करें- मम अस्य कुमारस्य गर्भाम्बुपान जनित सकलदोष निबर्हणायुर्मेधाभिवृद्धि बीज गर्भ समुद्भवैनो निबर्हण द्वारा श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं जातकर्माख्यं कर्म करिष्ये । तदंगत्वेन गणपत्यादि पूजनमहं करिष्ये ।

शुद्ध पात्र में या काँस्यपात्र में मधु एवं घृत को सुवर्णशलाका या अनामिका से एकीकृत करे एवं कुमार को प्राशन करायें या सुंघावे ।

ॐ भूस्त्वयि दधामि । ॐ भुवस्त्वयि दधामि । ॐ स्वस्त्वयि दधामि । ॐ भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि ।

इस तरह यह कुमार का मेघाजनन संस्कार हुआ । कुमार के दक्षिण कर्ण के पास , नाभि समीप आयुष्य मंत्र व गायत्री मंत्र जपे ।

॥आयुष्य मंत्राः॥

ॐ अग्निरायुष्मान्स वनस्पतिभिरायुष्मांस्तेन त्वायुषायुष्मन्तं करोमि ॥ ॐ सोम आयुष्मान्स ओषधिभिरायुष्मांस्तेन त्वायुषायुष्मन्तं करोमि ॥ ॐ ब्रह्मायुष्मत्तद् ब्राह्मणैरायुष्मत्तेन त्वायुषायुष्मन्तं करोमि ॥ ॐ ऋषय आयुष्मन्तस्ते व्रतैरायुष्मन्तस्तेन त्वायुषायुष्मन्तं करोमि । ॐ पितर आयुष्मन्तस्ते स्वाधाभिरायुष्मन्तस्तेन त्वायुषायुष्मन्तं करोमि । ॐ यज्ञ आयुष्मान्स दक्षिणारायुष्मांस्तेन त्वायुषायुष्मन्तं करोमि । ॐ समुद्र आयुष्मान्स स्रवन्तीभिरायुष्मांस्तेन त्वायुषायुष्मन्तं करोमि ।

इन मंत्रों की तीन आवृत्ती करें । इसके बाद व्यायुष मंत्रों को ३ बार जपे ।

ॐ त्र्यायुषञ्जमदग्नेः । कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषुत्र्यायुषम् तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् ।

समय हो तो ऋग्वेद की ११ ऋचायें भी कुमार को सुनावें ।

ॐ दिवस्परि प्रथमञ्जज्ञे अग्निरस्मद् द्वितीय परिजात वेदाः । तृतीयमप्सुनृमणा अजस्त्रमिन्धान एनज्जरतेस्वाधीः ॥१ ॥

विद्माते अग्नेत्रिधा त्रयाणि विद्मातेधाम विभृता पुरुषा । विद्माते नाम परमડ્•गुहा यद् विद्मात – मुत्संयत आजगन्थ ॥२ ॥

समुद्रे त्वा नृमणा अप्स्वन्तर्नृचक्षा इधेदिवो अग्न ऊधन् । तृतीये त्वा रजसितस्थिवा ग्गुँ समपामुपस्थे महिषा अवर्द्धन् ॥३ ॥

अक्रन्ददग्निस्तनयन्निवद्यौः क्षामारेरिहद् वीरुधः समञ्जन् । सद्योजज्ञानो विहीमिद्धो अख्यदारोदसी भानुन भत्यन्तः ॥४ ॥

श्रीणामुदारोधरुणो रयीणांमनीषाणां प्रार्पणः सोमगोपाः । वसुः सूनुः सहसो अप्सुराजा विभात्यग्र उषसाभिधानः ॥५ ॥

विश्वस्य केतु – र्भुवनस्य गर्भ आरोदसी अपृणा जायमानः । वीडुञ्चिद द्रिमभिनत्परायञ्जनाय दग्निमय – जन्तपञ्च ॥६ ॥

उशिक्पावको अरतिः सुमेधामर्त्येष्वग्निरमृतो निधायि । इयार्तिधूम मरुषं भरिभ्रदुच्छुक्रेण शोचिषाद्यामि नक्षन् ॥७॥

दृशानो रुक्म उर्व्याव्यद्योदुर्मर्षमायुः श्रिये रुचानः । अग्निग्नरमृतो अभवद्वयोभि – र्यदेनंद्यौर जनयत्सुरेताः ॥८ ॥

यस्ते अद्य कृणवद्भद्रशोचे पूपन्देव घृतवन्तमग्ने । प्रतन्नय प्रतरंवस्यो अच्छाभिसुमन्देव भक्तं यविष्ठ ॥९ ॥

आतम्भजसौश्व वसेष्वग्न उक्थ उक्थ आभज शस्यमाने । प्रियः सूर्ये प्रियो अग्नाभवात्युजातेन भिनदुजनित्वै ॥१० ॥

त्वामग्ने यजमाना अनुध्यून्विश्वावसु दधिरेवार्याणि । त्वयासहद्रविणमिच्छमाना व्रजङ्गोमन्तमुशिजो विवव्रुः ॥११ ॥

इसके बाद बालक के चारों तरफ चार दिशाओं एवं एक मध्य या नैऋत्य में खड़ा करें एवं वे कुमार को लक्षित कर कहें ।

चारों दिशाओं में प्रेषित करें । यथा- इममनुप्राण । प्राण इति पूर्वः ॥ इममनुव्यान । व्यानेति दक्षिणः ॥ इममन्वपान । अपानेति अपरः ॥ इममनूदान । उदानेत्युत्तर ॥ इममनुसमान । समानेति पंचमः । उपरिष्टादवेक्षमाणो ब्रूयात् ।

ब्राह्मणों की अनुपस्थिति में यजमान प्राण , व्यान , अपान , उदान , समानादि वायु का उच्चारण कर पूर्वादि क्रम से परिक्रमा करें । बालक जिस भूमि पर जन्मा हो वहाँ या अन्य भूमि को अभिमंत्रित करें ।

ॐ वेदते भूमि हृदयन्दिवि चन्द्रमसिश्रितम्।वेदाहन्तंमान्तद्विद्यात्पश्येम शरदः शतञ्जीवेम शरदः शतः र्ठ शृणुयाम शरदः शतम् ।

शिशु को स्पर्श करें ॐ अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्रतम्भव । आत्मा वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम् ॥ नान्दी श्राद्ध हेतु सुवर्णदान करें । माता शिशु को दुग्धपान करावें

॥ इति जातकर्म संस्कार प्रयोगः ॥