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अथ गोमुखप्रसव प्रयोग विधि

अथ गोमुखप्रसव प्रयोग विधि

यजमान सपत्नीक पूर्वाभिमुख होकर आसन ग्रहण करें । ब्राह्मण भद्रसूक्त व शान्तिसूक्त का पाठ करें ।

संङ्कल्प – श्री विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः …… अद्य दिने अस्य बालकस्य अमुक नक्षत्रोत्पत्ति ( अमुकयोगोत्पत्ति ) सूचितारिष्ट शान्त्यर्थं गोमुख प्रसव शांति करिष्ये । तत्रादौ दिग्रक्षणं कलशाराधनं गणपति पूजनं आचार्य वरणं च करिष्ये ।

स्वस्तिक पर गणेशजी की प्रतिमा या सुपारी रखकर पूजा करायें । आचार्य ईशान भाग में अबीर , गुलाल या श्वेत चूर्ण अथवा चावलों से अष्टदल बनायें । यथा शक्ति अनाज रखें । नया शूर्प ( छाजला , अनाज साफ करने का पात्र ) अष्टदल व अनाज पर रखें । शूर्प में लाल वस्त्र बिछायें कुछ तिल बिखेरें । बालक को चित्त अवस्था में पूर्व की ओर शिर रखते हुए सुलावें । तदुपरान्त शूर्प सहित बालक को मोली से लपेटे । ( यह गर्भ योनि की भावना हुई ) ।

गाय को बालक के पास लावे , गाय का मुख बालक की ओर होवे । माना कि शिशु गृह भाग में है और गाय बाह्य है , गाय का शिशु से संबन्ध कठिन है तो शूर्प से मोली का धागा ले जाते हुये गाय के मुँह से अन्वारब्ध करें । गाय की प्राप्ति भी संभव नहीं हो तो शूर्प को ही गाय की योनिगर्भ मानें ।

गाय के शरीर में गर्भ की पुष्टि की भावना निम्न मंत्रों से करें-

योनिं विष्णुः कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु । प्रजापतिः प्रसिञ्चतु सृष्टा गर्भं ददातु ॥१ ॥

धेहि गर्भं सिनीवालि धेहिगर्भं पृथुष्टके । ते देवावश्विनौ गर्भमाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥२॥

हिरण्ययी अरणीयं अश्विना निर्मथतः । गर्भं हवामहे तं ते दशमे मासि सूतवे ॥३॥

परापते न जायेत पुनः सुपुत्र आपतत् । मेस्यै च पुत्रकामायै गर्भं धेहि प्रसूतवे ॥४॥

फिर गाय के सब अंगों पर हाथ फेरें ।

गवामंगेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश । यस्मात्तस्माच्छिवं मे स्यादिह लोके परत्र च ॥

पश्चात् शूर्प में से बालक की मोली हटाकर वस्त्र सहित निकाले । शूर्प के आगे त्रिकोणाकार भाग मोली से या तीन सरकण्डों के मुँहो को मिलाकर बनावें आचार्य उस त्रिकोणाकार में से बालक को ढके हुये मुँह सहित निकालकर माता को देवें , माता बालक को पिता को देवें । साधारणत : यह क्रिया लौकिक में तीन बार करते है अत : पिता बालक को आचार्य को देवें , आचार्य मोली में से निकाल कर माता को देवें एवं माता पिता को देवें ऐसा तीसरी बार फिर करें । पिता वस्त्र हटाकर बालक का मुँह देखें । आचार्य पंचगव्य से बालक के छीटें देवें ध्यान रखें बालक की आँखों में नहीं गिरे ।

मंत्र- आपोहिष्ठा मयो भुवस्तान उर्जे दधातन । महेरणाय चक्षसे । यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयते हनः । उशती रिव मातरः । तस्मा अरंगमामवो । यस्यक्षयाय जिन्वथ । आपो जन यथाचनः ।

पिता पुत्र के मस्तक को तीन बार सूंघकर माता को दे देवें ।

मंत्र-ॐ अंगादंगात्संभवसि हृदयादधि जायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदां शतम् ॥

पिता ब्राह्मणों से कहें- भो ब्राह्मणा : गोमुख प्रसव कर्मणः पुण्याहं भवंतो ब्रुवन्तु ।

ब्राह्मण – अस्तु पुण्याहम् ।

पिता – भो ब्राह्मणा : गोमुख प्रसव कर्मणः कल्याणं भवंतो ब्रुवन्तु ।

ब्राह्मण – अस्तु कल्याणम् ।

पिता- भो ब्राह्मणाः गोमुख प्रसव कर्मणः स्वस्तिं भवन्तो ब्रुवन्तु ।

ब्राह्मण – ॐ आयुष्मते स्वस्ति ।

पिता- भो ब्राह्मणा : गोमुख प्रसव कर्मणः श्रीरस्त्विति भवन्तो ब्रुवन्तु ।

ब्राह्मण- ॐ अस्तु श्रीः ।

पिता – भो ब्राह्मणा : गोमुख प्रसव कर्मणः ऋद्धिं भवन्तो ब्रुवन्तु ।

ब्राह्मण – ॐ ऋद्ध्यताम्।आनन्दमस्तु ॥

गोदान हेतु संकल्प करें- कृतैतद् गोमुख प्रसव शान्ति कर्मण : सांगता सिद्ध्यर्थे इमां गां सोपस्कर सहितां रुद्रदेवत्वं अमुक गोत्राय अमुक नाम्ने शर्मणां तुभ्यमहं संप्रददे ।

छोटी वेदी बनाकर उसके पंचभूसंस्कार करें । अथवा नित्य होमपात्र की स्थापना कर शुद्धि कर अग्नि की स्थापना करें । ब्रह्मा की स्थापना करें आचार्य – वरण करें ।

नवग्रह मण्डल पर केवल नवग्रहों का आवाहन करें । अधिदेवता आदि का आवाहन नहीं करें । सूतिका से सूर्य पूजन करायें ।

ग्रह मंडल के पास एक कलश की स्थापना करें , उस पर पूर्ण पात्र रखें , पूर्ण पात्र पर तीन सुपारियाँ रखकर उनमें विष्णु , वरुण एवं यक्ष्महण देवता का आवाहन करें ।

विष्णु – ॐ तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यंति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । ॐ विष्णवे नमः , विष्णुमावाहयामि ॥

वरुण- ॐ तत्त्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः । अहेडमानो वरुणो हवोधुरुश ग्गुँ समान आयुः प्रमोषीः ॥ ॐ वरुणाय नमः । वरुणमावाहयामि स्थापयामि ॥

यक्षमहण – ॐ अक्षिभ्यान्ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां चिबुका दधि । यक्ष्म शीर्षण्यं शीर्षण्यं मस्तिका जिह्वाया विवृहामिते ॥ ॐ यक्ष्मणे नमः । यक्ष्मणमावाहयामि स्थापयामि ।

सुपारियों पर हाथ रखकर प्राणों की भावना करें ।

अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठंतु अस्यै प्राणाः क्षरंतु च । अस्यै देवत्वमर्चायै देवत्वमर्चायै मा महेति च कश्चन ॥

ॐ मनोजूति ० मंत्र से प्रतिष्ठा करें ।

ॐ विष्णवाद्यावाहित देवताभ्यो नमः । इनका षोडशोपचार पूजन पश्चात् देवता रूपी सुपारियों पर हाथ रखें अथवा हाथ जोड़े ।

मंत्रा : ॐ यतमिन्द्रं भयामहे ततो नो अभयं कृधि । मघवन् छिन्वि तव तन्न उतिभिर्विद्विषो विभृधोजहि ॥१ ॥

ॐ त्वं हि राधसस्पते राधसो महः क्षयस्यांसि विधतः । तं त्वा वयं मधवन्निद्र गीर्वणः ! सुतावन्तो हवामहे ॥२ ॥

ॐ इन्द्रस्य कुत वृत्रहा परस्या नो वरेण्यः । स नो रक्षियच्चरमं समध्यमं स पश्चात् पातु नः पुरः ॥३ ॥

ॐ त्वन्नः पश्चादधरादुतरा पुरइन्द्रं निपाहि विश्वतः । आरे अस्मत् कृणुहि दैव्यं भयमा रे हेती र देवीः ॥४ ॥

ॐ अद्याद्याश्वश्च इन्द्रत्राश्व परे च नः । विश्वाच नो जरितॄनसत् पथे अहा दिवानक्तं चरक्षिषः ॥५ ॥

ॐ प्रभंगी शूरो मघवा तुवी मद्यः संमिलो वीर्यायकम् । अभाते बाहु वृषणा शतक्रतो निया वज्रं मिमिक्षतु ॥६ ॥

पश्चात् घी की आहुतियाँ देवें ।

ॐ प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापते न मम ॥ ॐ इन्द्राय स्वाहा । इदं इन्द्राय न मम ॥ ॐ अग्निये स्वाहा । इदं अग्निये न मम ॥ ॐ सोमाय स्वाहा । इदं सोमाय न मम ॥

अग्नि का पूजन करें- ॐ शांतिके वरदनाम्ने वैश्वानराय नमः ।

घृत आहुति देवें । ॐ प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापते न मम ॥

पश्चात् एक पात्र में घृत , मधु एवं दही का मिश्रण कर उससे हवन करें । ४ आहुति वरुण , १ विष्णु की एवं ७ यक्ष्महण हेतु देखें ।

मंत्र- ॐ आपोहिष्ठामयो भुवस्तान ऊर्जेदधातन । महेरणाय चक्षसे स्वाहा । इदमद्भ्यो न मम ॥१ ॥

ॐ योवः शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेहनः । उशतीरिव मातरः तस्मा अरंगमामवो यस्य क्षयाय जिन्वथ स्वाहाः । इदं मदभ्यो न मम ॥२ ॥

ॐ आपोजन यथाचनः स्वाहा । इदमद्भ्यो न मम ॥३ ॥

ॐ अप्सुमे सोमो अब्रवीदन्त विश्वानि भेषजाः । अग्निं च विश्वशं भुवमापश्च विश्वभेषजी : स्वाहा । इदमद्भ्यो न मम ॥४ ॥

ॐ तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यंति सूरयः । दिवीव चक्षुरायतं स्वाहा । इदं विष्णवे न मम ॥५ ॥

ॐ अक्षीभ्यां नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां चिबुका दधि । यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिका जिह्वया विवृहामिते स्वाहा ॥ इदं यक्ष्मणे न मम ॥६ ॥

ॐ ग्रीवाभ्यस्त उषणिहाभ्य : कीकसेभ्यो अनूक्यात् । यक्ष्मं दोषं साभ्यां बाहुभ्यां विवृहामिते स्वाहा ॥ इदं यक्ष्मणे न मम ॥७ ॥

ॐ आंतेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोह्रदयादर्धि । यक्ष्मं मतस्नाभ्यां यक् न : प्लक्षिभ्यो विवृहामिते स्वाहा ॥ इदं यक्ष्मणे न मम ॥८ ॥

ॐ उरुभ्यांते अष्टीवंदभ्यां पार्ष्णिभ्यां प्रपदाभ्याम् । यक्ष्मं श्रोणीभ्यां मासदाद्भंससा विवृहामिते स्वाहा ॥ इदं यक्ष्मणे न मम ॥९ ॥

ॐ मेहनाद्धन करणाल्लोमभ्यस्ते नरवेभ्यः । यक्ष्मं सर्वस्मादात्मन्सत्मिदं विवृहामिते स्वाहा ॥ इदं यक्ष्मणे न मम ॥१० ॥

ॐ अंगादंगाल्लोम्नो लोम्नो जातं पर्वणि पर्वणि । यक्ष्मं सर्वस्मादात्मन स्तमिदं विवृहामिते स्वाहा ॥ इदं यक्ष्मणे न मम ॥११ ॥

ॐ नाशयित्री बलासस्यार्श स उपचितामसि । अथो शतस्य यक्ष्माणाम्पाकारोरसि नाशनी स्वाहा ॥ इदं यक्ष्मणे न मम ॥१२ ॥

ॐ यक्ष्मणे स्वाहा । इसकी ८ या २८ आहुतियाँ देवें ।

इसके बाद नवग्रहों की एक – एक आहुति देवें ।

ॐ सूर्याय स्वाहा । ॐ चन्द्रमसे स्वाहा । ॐ भोमाय स्वाहा । ॐ बुधाय स्वाहा । ॐ गुरवे स्वाहा । ॐ शुक्राय स्वाहा । ॐ शनैश्चराय स्वाहा । ॐ राहवे स्वाहा । ॐ केतवे स्वाहा ।

अग्नि का पूजन कर स्विष्टकृत होम करें ।

ॐ स्वाहा स्वधा युताग्नये वैश्वानराय नमः । ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । इदमग्नये स्विष्टकृते न मम ।

बचा हुआ मधु , दही , घृत का मिश्रण होमाग्नि में डाल देवें ।

पश्चात् प्रायश्चित होम करके अग्नि वरुणादि की आहुतियाँ देकर प्रजापते स्वाहा से होम करें । यथा-

ॐ भूः स्वाहा । इदमग्नये न मम ॥ ॐ भुवः स्वाहा । इदं वायवे न मम ॥ ॐ स्वः स्वाहा । इदं सूर्याय न मम ॥

ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अवयासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वह्नितमः शोचुचानो विश्वाद्वेषा ग्गुँ सि पमुमुध्यस्मत् स्वाहा ॥ इदं वरुणाय न मम ॥

ॐ सत्वन्नो अग्ने वमोभवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ । अवयक्ष्वणो वरुण ग्गुँ रराणो वीहि मृडीक ग्गुँ सुहवोन एधि स्वाहा ॥ इदं वरुणायादित्यायादितये न मम ॥

ॐ अयाश्चाग्ने स्वनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्व मया असि । अयानो यज्ञं वहास्य यानो धेहि भेषज ग्गुँ स्वाहा ॥ इदमग्नये अयसे न मम ॥

ॐ ये ते शतं ये वरुणं ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः । ते भिर्नो अद्यसवितोत विष्णुर्विश्वे मुंचन्तु मरुतः स्वर्कास्वाहा ॥ इदं वरुणाय सावित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वकेभ्यश्च न मम ॥

ॐ उदुत्तमं वरुणपाशमस्तदवाधमं विमध्यम ग्गुँ श्रथाय अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा । इदं वरुणायादित्यायादितये न मम ॥

ॐ प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये न मम ॥

ॐ अग्ने स्विष्टकृते स्वाहा । इदमग्नये स्विष्टकृते न मम ॥

प्रणिता को ईशान में उल्टी कर देवें , संस्रव प्राशन करावें ।

प्रोक्षणी के जल से यजमान के छींटे देवें । कलश के जल से यजमान के शांत्याभिषेक कर आशीर्वाद देवें ।

॥ इति गोमुख प्रसव शांति प्रयोगः ॥