
Navratri Special नवरात्रि विशेष
Navratri Special नवरात्रि विशेष
नवरात्रि का पर्व देवी शक्ति मां दुर्गा की उपासना का उत्सव है । नवरात्रि के नौ दिनों में देवी शक्ति के नौ अलग अलग रूप की पूजा आराधना की जाती है । एक वर्ष में पांच बार नवरात्र आते हैं , चैत्र , आषाढ़ , अश्विन , पौष और माघ नवरात्र । इनमें चैत्र और अश्विन यानि शारदीय नवरात्रि को ही मुख्य माना गया है । इसके अलावा आषाढ़ , पौष और माघ गुप्त नवरात्रि होती है
विद्वानो के अनुशार सम्पूर्ण नवरात्रव्रत के पालन में जो लोगों असमर्थ हो वह नवरात्र के सात रात्री , पांच रात्री , दों रात्री और एक रात्री का व्रत भी करके लाभ प्राप्त कर सकते हैं । नवरात्र में नवदुर्गा की उपासना करने से नवग्रहों का प्रकोप शांत होता हैं ।
देवी उपासना में उपयुक्त एवं निषिद्ध पत्र पुष्प
• विद्वानों के मतानुशार जो पत्र – पुष्प भगवान शिवजी को प्रिय हैं या जो शिवजी को अर्पण किये जाते हैं वे सभी पत्र – पुष्प देवी भगवती को भी प्रिय हैं ।
• देवी भगवती को अपामार्ग अधिक प्रिय हैं , इस लिए अधिकतर देवी पूजन में अपामार्ग विशेष रुप से चढाया जाता हैं ।
• इस के अलावा विद्वानो का कथन हैं की जो पत्र – पुष्प शास्त्रोक्त विधान से भगवान शिव की पूजा में निषेध हैं उसे भी देवी पूजन में चढ़ाये जा सकते हैं ।
• देवी भगवती को सभी प्रकार के लाल फूल चढाएं जा सकते हैं क्योकि लाल रंग के सभी फूल भगवतीको प्रिय हैं तथा सुगन्धित समस्त श्वेत फूल भी भगवतीको अधिक प्रिय हैं ।
• देवी भगवती के पूजन में चमेली , मदार , केसर , बेला , श्वेत और लाल फूल , श्वेत कमल , पलाश , तगर , अशोक , चंपा , मौलसिरी , कुंद , लोध , कनेर , आक , शीशम और अपराजित ( अर्थात शंखपुष्पी ) आदिका उपयोग किया जा सकता हैं ।
• कुछ जानकारों का कथन हैं की देवी भगवती के पूजन में आक और मदार यह दो फूलों को निषेध हैं ।
• यही कारण हैं की उक्त दोनों फूल को विभिन्न मत के कारण देवी दुर्गा के पूजन मे उपयोग भी किय जाते हैं और निषिद्ध भी माने जाते हैं ।
• यदि किसी कारण वश जब अन्य उपयुक्त फूल न मिले तब इन दोनोंका उपयोग किया जा सकता हैं ।
• देवी दुर्गा को छोड़कर देवियों पर इन दोनों को नहीं चढाना चाहिए । लेकिन देवी दुर्गा पर चढ़ाया जा सकता हैं । क्योंकि कुछ जानकारों का मत हैं की दुर्गाकी पूजामें इन दोनोंका विधान शास्त्रोक्त हैं ।
• शमी , अशोक , कर्णिकार ( कनियार या अमलतास ) , गूमा , दोपहरिया , अगस्त्य , मदन , सिन्दुवार , शल्लकी , माधव आदि लताएँ , कुशकी मंजरियाँ , बिल्वपत्र , केवड़ा , कदम्ब , भटकटैया , कमल ये फूल देवी भगवती को प्रिय हैं ।
• आक और मदारकी तरह दूर्वा , तिलक , मालती , तुलसी , भंगरैया और तमाल उपयुक्त एवं प्रतिषिद्ध हैं अर्थात ये शास्त्रोंसे विहित भी हैं और निषिद्ध भी हैं ।
• विहित – प्रतिशिद्धके सम्बन्धके तत्त्वसागरसंहिताक में उल्लेख हैं कि जब शास्त्रोंसे विहित फूल न मिल पायें तो विहित – प्रतिषिद्ध फूलोंसे पूजा कि जा सकती हैं ।
नवरात्र में देवी को भोग अर्पण
नवरात्र के नौ दिनों में तीन देवियों क्रमशः पार्वती , लक्ष्मी और सरस्वती और देवी के नौ रुपों का कमशः शैलपुत्री , ब्रमाचारिणी , चंद्रघण्टा , कूष्माण्डा , स्कंदमाता , कात्यायनी , कालरात्रि , महागौरी और सिद्धिदात्री का पूजन किया जाता हैं । , नवरात्रे के प्रथम तीन दिन पार्वती के तीन स्वरूपों का पूजन किया जाता हैं , अगले तीन दिन माँ लक्ष्मी के स्वरुपों का पूजन किया जाता हैं और आखिरी के तीन दिन सरस्वती माता के स्वरुपों की पूजा की जाती हैं । उसी प्रकार नौ देवीयों को क्रमशः प्रथम दिन शैलपुत्री , द्वितीय दिन ब्रह्माचारिणी , तृतीय दिन चन्द्रघण्टा , चतुर्थ दिन कुष्माण्डा , पंचम् दिन स्कन्द माता , षष्ठम् दिन कात्यायिनी , साप्तम् दिन कालरात्रि , अष्टम् दिन महागौरी और नौवें दिन सिद्धिदात्री के रुप का पूजन किया जाता हैं ।
नवरात्र के नौ दिनों तक भक्त के मन में यह कौतुहल होता हैं , कि वह माता को भोग में क्या चढ़ाये , जिससे माँ शीघ्र प्रसन्न हो जाये . हिन्दू धर्म में कोई भी त्यौहार , व्रत – उपवास देवी – देवताओं को भोग , प्रसाद अर्पण किये बिना संपन्न नहीं होता है । नवरात्रे के नौ दिन में नौ देवियों को अलग – अलग भोग लगाने का विधान धर्मशास्त्रों में वर्णित हैं ।
नवरात्र के प्रथम दिन देवी शैलपुत्री : नवरात्र के प्रथम दिन मां के शैलपुत्री स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं । पर्वतराज ( शैलराज ) हिमालय के यहां पार्वती रूप में जन्म लेने से भगवती को शैलपुत्री कहा जाता हैं । इस दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके नैवेद्य के रूप में देवी को गाय का घृत ( घी ) अर्पण करना चाहिए । मां को चरणों चढ़ाये गये घृत को ब्राम्हणों में बांटने से रोगों से मुक्ति मिलती है । देवी कृपा से व्यक्ति सदा धन – धान्य से संपन्न रहता हैं । अर्थात उसे जिवन में धन एवं अन्य सुख साधनो को कमी महसुस नहीं होती । click here for more details
नवरात्र के द्वितीय दिन ब्रह्माचारिणी : नवरात्र के दूसरे दिन मां के ब्रह्मचारिणी स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं । क्योकि ब्रह्म का अर्थ हैं तप । मां ब्रह्मचारिणी तप का आचरण करने वाली भगवती हैं इसी कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया । इस दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके देवी को चीनी का भोग लगाकर दान करना चाहिए । चीनी का भोग लागाने से मनुष्य दीर्घजीवी होता हैं । देवी कृपा से व्यक्ति को अनंत फल कि प्राप्ति होती हैं । व्यक्ति में तप , त्याग , सदाचार , संयम जैसे सद् गुणों कि वृद्धि होती । click HERE for more details
नवरात्र के तृतीय दिन चन्द्रघंटा : नवरात्र के तीसरे दिन मां के चन्द्रघण्टा स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं । चन्द्रघण्टा का स्वरुप शांतिदायक और परम कल्याणकारी हैं । चन्द्रघण्टा के मस्तक पर घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र शोभित रहता हैं । इस लिये मां को चन्द्रघण्टा देवी कहा जाता हैं । इस दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके देवी को दूध का भोग लगाकर दान करना चाहिए । दूध का भोग लागाने से व्यक्ति को दुखों से मुक्ति मिलती हैं । देवी कृपा से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती हैं उसे समस्त सांसारिक आधि – व्याधि से मुक्ति मिलती हैं । इसके उपरांत व्यक्ति को चिरायु . आरोग्य , सुखी और संपन्न होनता प्राप्त होती हैं । व्यक्ति के साहस एव विरता में वृद्धि होती हैं । व्यक्ति स्वर में मिठास आती हैं उसके आकर्षण में भी वृद्धि होती हैं । चन्द्रघण्टा को ज्ञान की देवी भी माना गया है । click HERE for more details
नवरात्र के चतुर्थ दिन कूष्माण्डा : नवरात्र के चतुर्थ दिन मां के कूष्माण्डा स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं । अपनी मंद हंसी द्वारा ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया था इसीके कारण इनका नाम कूष्माण्डा देवी रखा गया । इस दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके देवी को मालपुआ भोग लगाकर दान करना चाहिए । मालपुए का भोग लागाने से व्यक्ति कि विपत्ति का नाश होता हैं । देवी कृपा से व्यक्ति को सभी प्रकार के रोग , शोक और क्लेश से मुक्ति मिलती हैं , उसे आयुष्य , यश , बल और बुद्धि प्राप होती हैं । click HERE for more details
नवरात्र के पंचम दिन स्कंदमाता : नवरात्र के पांचवें दिन मां के स्कंदमाता स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं । स्कंदमाता कुमार अर्थात् कार्तिकेय कि माता होने के कारण , उन्हें स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता हैं । इस दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके देवी को केले का भोग लगाकर दान करना चाहिए । केले का भोग लागाने से व्यक्ति कि बुद्धि , विवेक का विकास होता हैं । व्यक्ति परिवारीकसुख समृद्धि में वृद्धि होती हैं । देवी कृपा से व्यक्ति कि समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती हैं एवं जीवन में परम सुख एवं शांति प्राप्त होती हैं । click HERE for more details
नवरात्र के षष्ठम् दिन कात्यायनी: नवरात्र के छठे दिन मां के कात्यायनी स्वरुप का पूजन करने का विधान हैं । महर्षि कात्यायन कि पुत्री होने के कारण उन्हें कात्यायनी के नाम से जाना जाता हैं । इस दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके देवी को मधु ( शहद , महु , मध ) का भोग लगाकर दान करना चाहिए । मधु का भोग लागाने से व्यक्ति को सुंदर स्वरूप कि प्राप्ति होती हैं । कात्यायनी देवी को वैदिक युग में ये ऋषि – मुनियों को कष्ट देने वाले रक्ष – दानव , पापी जीव को अपने तेज से ही नष्ट कर देने वाली माना गया हैं । click HERE for more details
नवरात्र के सप्तम् दिन कालरात्रि: नवरात्र के सातवें दिन मां के कालरात्रि स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं । कालरात्रि देवी के शरीर का रंग घने अंधकार कि तरह एकदम काला हैं । इस दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके देवी को गुड़ का भोग लगाकर दान करना चाहिए । गुड़ का भोग लागाने से व्यक्ति के समस्त शोक दूर होते हैं । कालरात्रि के पूजन से अग्नि भय , आकाश भय , भूत पिशाच इत्यादी शक्तियां कालरात्रि देवी के स्मरण मात्र से ही भाग जाते हैं , कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक होते हुवे भी सदैव शुभ फल देने वाला होता हैं , इस लिये कालरात्रि को शुभंकरी के नामसे भी जाना जाता हैं । कालरात्रि शत्रु एवं दुष्टों का संहार कर ने वाली देवी हैं । click HERE for more details
नवरात्र के अष्टम् दिन महागौरी: नवरात्र के आठवें दिन मां के महागौरी स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं । महागौरी स्वरूप उज्जवल , कोमल , श्वेतवर्णा होने के कारण इनका नाम महागौरी हैं । इस दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके देवी को श्रीफल ( नारियल ) का भोग लगाकर दान करना चाहिए । श्रीफल ( नारियल ) का भोग लागाने से व्यक्ति के संताप दूर होते हैं । महागौरी के पूजन करने वाले साधन के लिये मां अन्नपूर्णा के समान , धन , वैभव और सुख – शांति प्रदान करने वाली एवं संकट से मुक्ति दिलाने वाली देवी महागौरी हैं । click HERE for more details
नवरात्र के नवम् दिन सिद्धिदात्री: नवरात्र के नौवें दिन मां के सिद्धिदात्री स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं । माता सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियों की प्रदाता माना गया हैं । सिद्धिदात्री को समस्त्य सिद्धियों की स्वामिनी भी माना जाता हैं । इस दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके देवी को धान के लावे का भोग लागाने से व्यक्ति को लोक और परलोक का सुख प्राप्त होता हैं । सिद्धिदात्री के पूजन से व्यक्ति कि समस्त कामनाओं कि पूर्ति होकर उसे ऋद्धि , सिद्धि कि प्राप्ति होती हैं । पूजन से यश , बल और धन कि प्राप्ति कार्यों में चले आ रहे बाधा – विध्न समाप्त हो जाते हैं । व्यक्ति को यश , बल और धन कि प्राप्ति होकर उसे मां कि कृपा से धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष कि भी प्राप्ति स्वतः हो जाती हैं । click HERE for more details
नवरात्रि के लिए पूजा सामग्री ( Navratri Poojan Samagri ) नवरात्रि के व्रत रखने और पूजा करने का तभी लाभ होता है जब सब कार्य विधिपूर्वक किये जाएं । आज हम आपको नवरात्रि के लिए पूजा सामग्री बता रहे हैं । इसके लिए आ पको मां दुर्गा की नई तस्वीर , लाल चुन्नी , लाल कपड़ा , गंगा जल , माता का श्रृंगार , आम की पत्तियां , लौंग का जोड़ा , उपले , जौ के बीज , चंदन , नारियल , कपूर , गुलाल , पान के प त्ते , सुपारी और इलायची की आवश्यकता होती है ।
नवरात्रि पूजा विधि ( Navratri Ghat Sthapna Pooja Vidhi ) नवरात्रि में सुबह जल्दी उठना चाहिए और नित्यकर्म और स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनें और पूजा घर को साफ करें । इसके बाद नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना कर ने से पहले सभी तरह की पूजा सामग्रियों को एक जगह एकत्रित कर लें । इसके बाद मां दुर्गा की फोटो को लाल रंग के कपड़े में रखें । फिर पूजा की थाली को सजाएं उसमें स भी तरह की पूजा सामग्री को रखें । मिट्टी के पात्र में जौ के बीज को बोएं और नौ दिनों त क उसमें पानी का छिड़काव करें । नवरात्रि के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि पर शुभ मुहूर्त में कलश को लाल कपड़े में लपटेकर स्थापित करें । कलश में गंगाजल डाले और आम की पत्तियां रखकर उस पर जटा नारियल रखें ।
चैत्र नवरात्रि की कथा ( Chaitra Navratri Ki Katha / Story ) एक नगर में एक ब्राह्मण रहा करता था । वह मां भगवती दुर्गा का परम भक्त था । उस की एक कन्या थी । जिसका नाम सुमति था । ब्राह्मण नियम पूर्वक प्रतिदिन दुर्गा जी की पूजा और यज्ञ किया करता था । ब्राह्मण की बेटी भी प्रतिदिन इस पूजा में भाग लिया कर ती थी । एक दिन सुमति खेल में व्यस्ति हो गई और मां दुर्गा की पूजा में शामिल नहीं हुई । यह देखकर उसके पिता को अत्यंत क्रोध आ गया और उसने अपनी पुत्री से कहा वह उसका विवाह किसी दरिद्र और कोढ़ी से करा देगा । पिता की बात सुनकर उसकी बे टी को बहुत दुख हुआ । उसने पिता के द्वारा क्रोध में कही गई बात को स्वीकार कर लि या । अपनी बात के अनुसार उसके पिता ने अपने बेटी का विवाह एक दरिद्र और कोढ़ी व्यक्ति से करा दिया । सुमति अपने पति के साथ विवाह करके चली गई । उसके पति का घर न होने के कारण उसे वन में ही रात बड़ी मुश्किल से बीतानी पड़ी । उस कन्या की यह दशा देखकर मां भगवती उसके द्वारा किए गए पिछले जन्म के प्रभाव से प्रकट हो गईं और बोली हे कन्या मैं तुमसे अत्याधिक प्रसन्न हूं । इसलिए तुम मुझसे कुछ भी मां ग सकती हो । इस पर सुमति बोली की मां आप मुझ पर किस बात से प्रसन्न हैं । तब मां दुर्गा ने बताया कि पिछले जन्म में तुम एक भील की पत्नी थीं । एक दिन तुम्हारे पति की चोरी के कारण तुम्हें और तुम्हारे पति को जेल में बंद कर दिया गया था । उन सिपाहियों ने तुम्हें और तुम्हारे पति को कुछ भी खाने के लिए नहीं दिया था । जिसके कारण तुम्हा रा नवरात्रि का व्रत हो गया था । इसी वजह से मैं तुमसे प्रसन्न हूं । तुम कुछ भी मांग सक ती हो । इस पर उस कन्या ने कहा कि मां कृपा करके आप मेरे पति को कोढ़ दूर कर दीजिए । माता ने उसके कन्या के पति को रोग से मुक्त कर दिया । इसलिए नवरात्रि का व्रत करने वाले व्यक्ति को उसके हर जन्म में शुभ फलों की प्राप्ति होती है ।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र प्रयोग
दुर्गा सप्तशती में वर्णित सिद्ध कुंजिका स्तोत्र एक अत्यंत चमत्कारिक और तीव्र प्रभाव दिखाने वाला स्तोत्र है । जो लोग पूरी दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते वे केवल कुंजिका स्तोत्र का पाठ करेंगे तो उससे भी संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का फल मिल जाता है । जीवन में किसी भी प्रकार के अभाव , रोग , कष्ट दुख , दारिद्रय और शत्रुओं का नाश करने वाले सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ नवरात्रि में अवश्य करना चाहिए । लेकिन इस स्तोत्र का पाठ करने में कुछ सावधानियां भी हैं , जिनका ध्यान रखा जाना आवश्यक है ।
कुंजिका स्तोत्र का पाठ वैसे तो किसी भी माह , दिन में किया जा सकता है , लेकिन नवरात्रि में यह अधिक प्रभावी होता है । कुंजिका स्तोत्र साधना भी होती है , लेकिन यहां हम इसकी सर्वमान्य विधि का वर्णन कर रहे हैं । नवरात्रि के प्रथम दिन से नवमी तक प्रतिदिन इसका पाठ किया जाता है । इसलिए साधक प्रात : काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर अपने पूजा स्थान को साफ करके लाल रंग के आसन पर बैठ जाए । अपने सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें । सामान्य पूजन करें ।
अपनी सुविधानुसार तेल या घी का दीपक लगाए और देवी को हलवे या मिष्ठान्न का नैवेद्य लगाएं । इसके बाद अपने दाहिने हाथ में अक्षत , पुष्प , एक रुपए का सिक्का रखकर नवरात्रि के नौ दिन कुंजिका स्तोत्र का पाठ संयम – नियम से करने का संकल्प लें । यह जल भूमि पर छोड़कर पाठ प्रारंभ करें । यह संकल्प केवल पहले दिन लेना है । इसके बाद प्रतिदिन उसी समय पर पाठ करें ।
धन लाभ जिन लोगों को सदा धन का अभाव रहता हो । लगातार आर्थिक नुकसान हो रहा हो । बेवजह के कार्यों में धन खर्च हो रहा हो उन्हें कुंजिका स्तोत्र के पाठ से लाभ होता है । धन प्राप्ति के नए मार्ग खुलते हैं । धन संग्रहण बढ़ता है ।
शत्रु मुक्ति शत्रुओं से छुटकारा पाने और मुकदमों में जीत के लिए यह स्तोत्र किसी चमत्कार की तरह काम करता है । नवरात्रि के बाद भी इसका नियमित पाठ किया जाए तो जीवन में कभी शत्रु बाधा नहीं डालते । कोर्ट – कचहरी के मामलों में जीत हासिल होती है ।
रोग मुक्ति दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ जीवन से रोगों का समूल नाश कर देते हैं । कुंजिका स्तोत्र के पाठ से न केवल गंभीर से गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है , बल्कि रोगों पर होने वाले खर्च से भी मुक्ति मिलती है ।
कर्ज मुक्ति यदि किसी व्यक्ति पर कर्ज चढ़ता जा रहा है । छोटी – छोटी जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है , तो कुंजिका स्तोत्र का नियमित पाठ जल्द कर्ज मुक्ति करवाता है ।
सुखद दांपत्य जीवन दांपत्य जीवन में सुख – शांति के लिए कुंजिका स्तोत्र का नियमित पाठ किया जाना चाहिए । आकर्षण प्रभाव बढ़ाने के लिए भी इसका पाठ किया जाता है ।
देवी दुर्गा की आराधना , साधना और सिद्धि के लिए तन , मन की पवित्रता होना अत्यंत आवश्यक है । साधना काल या नवरात्रि में इंद्रिय संयम रखना जरूरी है । बुरे कर्म , बुरी वाणी का प्रयोग भूलकर भी नहीं करना चाहिए । इससे विपरीत प्रभाव हो सकते हैं ।
कुंजिका स्तोत्र का पाठ बुरी कामनाओं , किसी के मारण , उच्चाटन और किसी का बुरा करने के लिए नहीं करना चाहिए । इसका उल्टा प्रभाव पाठ करने वाले पर ही हो सकता है ।
श्री दुर्गा सप्तशती में से हम आपको एक एसा पाठ बता रहे हैं , जिसके करने से आपकी सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी । इस पाठ को करने के बाद आपको किसी अन्य पाठ की आवश्यकता नहीं होगी । यह पाठ है..सिद्धकुंजिकास्तोत्रम् । समस्त बाधाओं को शांत करने , शत्रु दमन , ऋण मुक्ति , करियर , विद्या , शारीरिक और मानसिक सुख प्राप्त करना चाहते हैं तो सिद्धकुंजिकास्तोत्र का पाठ अवश्य करें । श्री दुर्गा सप्तशती में यह अध्याय सम्मिलित है । यदि समय कम है तो आप इसका पाठ करके भी श्रीदुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ जैसा ही पुण्य प्राप्त कर सकते हैं । नाम के अनुरूप यह सिद्ध कुंजिका है । जब किसी प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा हो , समस्या का समाधान नहीं हो रहा हो , तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करिए । भगवती आपकी रक्षा करेंगी ।
भगवान शंकर कहते हैं कि सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ करने वाले को देवी कवच , अर्गला , कीलक , रहस्य , सूक्त , ध्यान , न्यास और यहां तक कि अर्चन भी आवश्यक नहीं है । केवल कुंजिका के पाठ मात्र से दुर्गा पाठ का फल प्राप्त हो जाता है ।
इसके पाठ मात्र से मारण , मोहन , वशीकरण , स्तम्भन और उच्चाटन आदि उद्देश्यों की एक साथ पूर्ति हो जाती है । इसमें स्वर व्यंजन की ध्वनि है । योग और प्राणायाम है ।
संक्षिप्त मंत्र ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ ( सामान्य रूप से हम इस मंत्र का पाठ करते हैं लेकिन संपूर्ण मंत्र केवल सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में है )
संपूर्ण मंत्र यह है ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे । ऊं ग्लौं हुं क्लीं जूं स : ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ।।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को अत्यंत सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए । प्रतिदिन की पूजा में इसको शामिल कर सकते हैं । लेकिन यदि अनुष्ठान के रूप में या किसी इच्छाप्राप्ति के लिए कर रहे हैं तो आपको कुछ सावधानी रखनी होंगी ।
1 संकल्प : सिद्ध कुंजिका पढ़ने से पहले हाथ में अक्षत , पुष्प और जल लेकर संकल्प करें । मन ही मन देवी मां को अपनी इच्छा कहें ।
2 जितने पाठ एक साथ ( 1 , 2 , 3 , 5 , 7. 11 ) कर सकें , उसका संकल्प करें । अनुष्ठान के दौरान माला समान रखें । कभी एक कभी दो कभी तीन न रखें ।
3 सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के अनुष्ठान के दौरान जमीन पर शयन करें । ब्रह्मचर्य का पालन करें ।
4 प्रतिदिन अनार का भोग लगाएं । लाल पुष्प देवी भगवती को अर्पित करें ।
5 सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में दशों महाविद्या , नौ देवियों की आराधना है ।
सिद्धकुंजिका स्तोत्र के पाठ का समय : रात्रि 9 बजे करें तो अत्युत्तम ।
2 रात को 9 से 11.30 बजे तक का समय रखें ।
लाल आसन पर बैठकर पाठ करें , दीपक घी का दीपक दायें तरफ और सरसो के तेल का दीपक बाएं तरफ रखें । अर्थात दोनों दीपक जलाएं
किस इच्छा के लिए कितने पाठ करने हैं
1 विद्या प्राप्ति के लिए … पांच पाठ ( अक्षत लेकर अपने ऊपर से तीन बार घुमाकर किताबों में रख दें )
2 यश – कीर्ति के लिए …. पांच पाठ ( देवी को चढ़ाया हुआ लाल पुष्प लेकर सेफ आदि में रख लें )
3 धन प्राप्ति के लिए … 9 पाठ ( सफेद तिल से अग्यारी करें )
4 मुकदमे से मुक्ति के लिए … सात पाठ ( पाठ के बाद एक नींबू काट दें । दो ही हिस्से हों ध्यान रखें । इनको बाहर अलग – अलग दिशा में फेंक दें )
5 ऋण मुक्ति के लिए …. सात पाठ ( जौं की 21 आहुतियां देते हुए अग्यारी करें । जिसको पैसा देना हो या जिससे लेना हो , उसका बस ध्यान कर लें )
6 घर की सुख – शांति के लिए … तीन पाठ ( मीठा पान देवी को अर्पण करें )
7 स्वास्थ्यके लिए.तीन पाठ ( देवी को नींबू चढाएं और फिर उसका प्रयोग कर लें )
8 शत्रु से रक्षा के लिए …. 3,7 या 11 पाठ ( लगातार पाठ करने से मुक्ति मिलेगी )
9 रोजगार के लिए . 3,5,7 और 11 ( एच्छिक ) ( एक सुपारी देवी को चढाकर अपने पास रख लें
10 सर्वबाधा शांति- तीन पाठ ( लोंग के तीन जोड़े अग्यारी पर चढ़ाएं या देवी जी के आगे तीन जोड़े लोंग के रखकर फिर उठा लें और खाने या चाय में प्रयोग कर लें ।
॥ सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥1॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥
गोपनीयं प्रयत्नेनस्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यंस्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत्कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥
॥ अथ मन्त्रः ॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालयज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वलहं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥
॥ इति मन्त्रः ॥
नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥1॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे॥2॥
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥3॥
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥4॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥5॥
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥6॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं।
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥7॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥8॥
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रंमन्त्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यंगोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुञ्जिकाया देविहीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायतेसिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥
॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
श्रीदुर्गा अष्टोत्तर शतनाम पूजन
संकल्पः ॐ तत्सत् अद्यतस्य ब्रह्मणोहिन द्वितीय प्रहरार्द्धे श्वेत वराह कल्पे जम्बू – द्वीपे भरत खण्डे आर्यावर्त देशे अमुक पुण्य क्षेत्रे कलियुगे कलि प्रथम चरणे अमुक सम्वत्सरे अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुक वासरे अमुक गोत्रो अमुक ( शर्मा , वर्मा अपने या जिसके लिये अनुष्ठान कर रहे हो उनके नाम का उच्चारण करें । ) अहं श्रीदुर्गा – प्रीत्यर्थे अष्टोत्तर शत नाम मन्त्रैः यथा शक्ति यजनं करिष्ये ।
( अमुक के स्थान पर अपना वर्तमान स्थान – संवत्स मास – पक्ष- -तिथि – वास- का उचारण करें और अमुक गोत्रो व नाम के स्थान पर जिसके लिये जप किया जा रहा हो उस व्यक्ति के गोत्र व नाम का उचारण करना चाहिए यदि स्वयं जप कर रहे हो तो स्वयंका गोत्र नाम लें )
विनियोगः ॐ अस्य श्रीदुर्गा अष्टोत्तर शतनाम माला मन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः , गायत्री छन्दः , श्रीदुर्गा देवता , दुं बीजं , ह्रीं शक्तिः , ॐ कीलकं , श्रीदुर्गा प्रीत्यर्थं श्रीदुर्गा अष्टोत्तर शत नाम पूजने विनियोगः ।
नोट : श्रीदुर्गा अष्टोत्तर नामावली के मन्त्रों से पूजन करते समय उक्त मन्त्र का उच्चारण कर विनियोग करना चाहिये । यदि सिर्फ नाम अर्थात मन्त्रों के द्वारा जप करना हो , तो पूजने विनियोग । के स्थान पर जपे विनियोगः । का उचारण करें और यदि पूजन के साथ विधिवत तर्पण करना हो , तो पूजने तर्पणे च विनियोगः । का उचारण करें । नाम मन्त्रों का होम करना हो , तो होमे विनियोगः । का उचारण करें । ऋष्यादि न्यास में भी उपरोक्त विधि से योजन करें ।
ऋष्यादि न्यासः श्रीनारद – ऋषये नमः । शिरसि , गायत्री छन्दसे नमः । मुखे , श्रीदुर्गा देवतायै नमः । हृदि , दुं बीजाय नमः । गुह्ये , ह्रीं शक्तये नमः । पादयो , ॐ कीलकाय नमः । नाभी , श्रीदुर्गा – प्रीत्यर्थं श्रीदुर्गा अष्टोत्तर शत नाम पूजने विनियोगाय नमः । सर्वांगे ।
षडङ्ग न्यास : ह्रां ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै । ह्रीं ॐ ह्रीं दुं दुर्गाय । हूं ॐ ह्रीं दूं दुर्गाय । हैं ॐ ह्रीं दुं दुर्गाय । ह्रौं ॐ ह्रीं दुं दुर्गाय । ह्रः ॐ ह्रीं दुं दुर्गाय ।
कर न्यास : अंगुष्ठाभ्यां नमः । तर्जनीभ्यां नमः । मध्यमाभ्यां नमः । अनामिकाभ्यां हुम । कनिष्ठिकाभ्यां वौषट । करतल – कर पृष्ठाभ्यां फट् ।
अंग न्यासः हृदयाय नमः । शिरसे स्वाहा । शिखायै वषट् । कवचाय हुम् । नेत्र – त्रयाय वौषट । अस्त्राय फट् ।
ध्यानः
सिंहस्था शशि – शेखरा मरकत – प्रख्या चतुर्भिभुजैः । शंख चक्र – धनुः – शरांश्च दधती नेत्रस्त्रिभिः शोभिता ॥ आमुक्तांगद – हार – कंकण – रणत – काञ्ची – क्वणन – नूपुरा । दुर्गा दुर्गति – हारिणी भवतु वो रत्नोल्लसत् – कुण्डला ॥
उक्त प्रकार ‘ ध्यान ‘ करने के बाद माँ दुर्गा का मानसिक पूजन करें ।
मानस पूजनः ॐ लं पृथ्वी तत्त्वात्मकम् गन्धम् श्रीजगदम्बा दुर्गा प्रीतये समर्पयामि नमः ॥ ॐ हं आकाश तत्त्वात्मकम् पुष्पं श्रीजगदम्बा दुर्गा प्रीतये समर्पयामि नमः ॥ ॐ यं वायु तत्त्वात्मकं धूपं श्रीजगदम्बा दुर्गा प्रीतये घर्पयामि नमः ॥
ॐ रं अग्नि – तत्त्वात्मकं दीपं श्रीजगदम्बा – दुर्गा – प्रीतये दर्शयामि नमः ॥ ॐ वं जल तत्त्वात्मकं नैवेद्य श्रीजगदम्बा दुर्गा प्रीतये निवेदयामि नमः ॥ ॐ शं सर्व तत्त्वात्मकं ताम्बूलम् श्रीजगदम्बा दुर्गा प्रीतये समर्पयामि नमः ॥
उक्त मन्त्र के उचारण के बाद में दुर्गा अष्टोत्तर शत नामावली का पाठ करें ।
त्रिबीज युक्त चतुर्थ्यन्त अष्टोत्तर शत नामावली
ॐ ह्रीं दुं श्रीसत्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसाध्व्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीभव – प्रीतायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीभवान्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीभव – मोचिन्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीआर्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीदुर्गायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीजयायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीआद्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीत्रि – नेत्रायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीशूल – धारिण्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीपिनाक – धारिण्ये पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीचित्रायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीचण्ड – घण्टायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीमहा – तपायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीमनो – रुपायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीबुद्धयै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअहंकारायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीचित्त – रुपायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीचितायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीचित्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसर्व – मन्त्र – मय्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीनित्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसत्यानन्द – स्वरुपिण्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअनन्तायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीभाविन्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीभाव्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअभव्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसदा – गत्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीशाम्भव्य पूजयामि नमः ।
ॐ ह्रीं दुं श्रीदेव – मातायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीचिन्तायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीरत्न – प्रयायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दं श्रीसर्व – विद्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीदक्ष – कन्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीदक्ष – यज्ञ – विनाशिन्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअपर्णायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअनेक – वर्णायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीपाटलायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीपाटलावत्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीपटाम्बर – परीधानायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीकल – मञ्जीर – रञ्जिन्यै नमः । ॐ हीं दुं श्रीअमेय – विक्रमायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीक्रूरायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसुन्दर्य पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसुर – सुन्दर्य पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीवन – दुर्गायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीमातंगयै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीमतंग – मुनि – पूजितायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीब्राह्मयै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीमाहेश्वर्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीऐन्द्रयै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीकौमार्य पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीवैष्णव्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीचामुण्डायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीवारायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीलक्ष्म्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीपुरुषाकृत्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीविमलायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दं श्रीउत्कर्षिण्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीज्ञानायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीक्रियायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसत्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीबुद्धिदायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीबहुलायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीबहुल – प्रियायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दु श्रीसर्व – वाहनायै पूजयामि नमः ।
ॐ ह्रीं दुं श्रीनिशुम्भ – शुम्भ – हनन्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीमहिषासुर – मर्दिन्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीमधु – कैटभ – हन्त्र्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीचण्ड – मुण्ड – विनाशिन्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसर्वासुर – विनाशायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसर्व – दानव – घातिन्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसर्व – शास्त्र – मय्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीविद्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसर्वास्त्र – धारिण्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअनेक – शस्त्र – हस्तायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअनेकास्त्र – विधारिण्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीकुमार्य पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीकन्यायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीकैशोर्य पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीयुवत्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीयत्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअप्रौढायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीप्रौढायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीवृद्ध – मातायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीबल – प्रदायै पूजयामि नमः ।
ॐ ह्रीं दुं श्रीमहा – देव्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीमुक्त – केश्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीघोर – रुपायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीमहा – बलायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअग्नि – ज्वालायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीरौद्र – मुख्य पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीकाल – रात्र्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीतपस्विन्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीनारायण्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीभद्रकाल्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीविष्णु – मायायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीजलोदर्य पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीशिव – दूत्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीकराल्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीअनन्तायै पूजयामि नमः । ॐ हीं दुं श्रीपरमेश्वर्य पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीकात्यायन्यै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीसावित्र्यै पूजयामि नमः । ॐ हीं दुं श्रीप्रत्यक्षायै पूजयामि नमः । ॐ ह्रीं दुं श्रीब्रह्म – वादिन्यै पूजयामि नमः ।
नवरात्रों में प्रातः दुर्गा पूजा के पश्चात दुर्गासप्तशती का नियमित पाठ करना आवश्यक है । पूरा पाठ न कर सकने पर खण्डशः पाठ करें । लघु श्री दुर्गासप्तशती का खण्डशः पाठ ( 1 ) विशेष रूप से संस्कृत नहीं जाननेवालों के लिए सभी अंगों के साथ पूरा पाठ समय सापेक्ष हो जाता है । अतः इसके विभिन्न प्रकार के पाठ की रूपरेखा उपलब्ध है । दुर्गासप्तशती के गुप्तवती टीकाकार ने एक पक्ष का उल्लेख किया है । एक दिन में एक चरित का पाठ कर तीन दिनों में एक आवृत्ति पाठ करें । इस पद्धति से प्रत्येक दिन आध्यायों की संख्या इस प्रकार होगी ।
नवरात्रों में प्रातः दुर्गा पूजा के पश्चात दुर्गासप्तशती का नियमित पाठ करना आवश्यक है । पूरा पाठ न कर सकने पर खण्डशः पाठ करें ।
श्री दुर्गासप्तशती का खण्डशः पाठ
( 1 ) विशेष रूप से संस्कृत नहीं जाननेवालों के लिए सभी अंगों के साथ पूरा पाठ समय सापेक्ष हो जाता है । अतः इसके विभिन्न प्रकार के पाठ की रूपरेखा उपलब्ध है । दुर्गासप्तशती के गुप्तवती टीकाकार ने एक पक्ष का उल्लेख किया है । एक दिन में एक चरित का पाठ कर तीन दिनों में एक आवृत्ति पाठ करें । इस पद्धति से प्रत्येक दिन आध्यायों की संख्या इस प्रकार होगी ।
प्रथम दिन : प्रथम अध्याय
द्वितीय दिन : द्वितीय से चतुर्थ अध्याय
तृतीय दिन : पंचम से त्रयोदश अध्याय
प्रत्येक दिन सप्तशती के अंगों का पाठ समान रूप से होगा ।
इसी प्रकार सप्ताह पारायण का भी विधान किया गया है । इस पाठ में क्रमशः 1 , 2 , 1 , 4 , 2 , 1 , 2 अध्याय प्रति दिन होगें ।
प्रथम दिन प्रथम अध्याय
द्वितीय दिन द्वितीय एवं तृतीय अध्याय
तृतीय दिन चतुर्थ अध्याय
चतुर्थ दिन पंचम से अष्टम अध्याय
पंचम दिन नवम एवं दशम अध्याय
षष्ठम दिन एकादश अध्याय
सप्तम दिन द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय
नवरात्र में तीन दिन में एक आवृत्ति का कल्प ( उपर पहला ) उपयुक्त है , क्योंकि इससे एक नवरात्र में तीन आवृत्ति हो जाती हैं ।
विषेश ध्यानः दुर्गा सप्तशती के अंगों का पाठ करना आवश्यक माना गया है । जैसे आत्मा अंगहीन होकर किसी भी कार्य में सक्षम नहीं होती , उसी प्रकार छ : अंगों से विहीन दुर्गासप्तशती पाठ की स्थिति होती है । अंगहीनों यथा देही सर्वकर्मसु न क्षमः । अंगवटकविहीना तु तथा सप्तशतीस्तुतिः
दुर्गासप्तशती के छ : अंगः कात्यायनी तन्त्र में अर्गला , कीलक , कवच , प्राधानिक रहस्य , मूर्ति – रहस्य एवं वैकृतिक – रहस्य इन छह स्तुतियों को सप्तशती का अंग माना गया है ।
कुमारी पूजन विधि
नवदुर्गा पूजा में कंजक ( कुमारी ) प्रत्यक्ष देवी मानी गयी है अतः भोजन , वस्त्र , आभूषण आदि से कंजक पूजा प्राचीन काल से की जाती रही है । यहां इस पूजन का शास्त्रीय विधान संक्षेप में दिया जा रहा है ।
कुमारी की उम्र , नाम , पूजा का फल एवं मन्त्र इस प्रकार हैं ।
| आयू | नाम | पूजा का फल | मन्त्र |
| 2 वर्ष | कुमारिका | दुख , दरिद्रता , शत्रु का नाश, धन आयुबल की वृद्धि | कुमारिकायै नमः |
| 3 वर्ष | त्रिमूर्ति | आयु , वंग , धन – धान्य पुत्र – पौत्रादि | त्रिमूर्तियै नमः |
| 4 वर्ष | कल्याणी | विद्या प्राप्ति , विजय , राज्य – लाभ , यशोलाभ | कल्याण्यै नमः |
| 5 वर्ष | रोहिणी | रोगनाश | रोहिण्यै नमः |
| 6 वर्ष | कालिका | शत्रु नाश | कालिकायै नमः |
| 7 वर्ष | चण्डिका | ऐश्वर्य , धर्म | चण्डिकायै नमः |
| 8 वर्ष | शाम्भवी | राज – सम्मोहन ,दुःख दारिद्रय नाश युद्ध में विंजय,क्रूर शुत्र का नाश, अभिचार कर्म में सिद्धि | शाम्भव्यै नमः |
| 9 वर्ष | दुर्गा | स्वर्ग लोक का सुख | दुर्गायै नमः |
| 10 वर्ष | सुभद्रा | मनोरथ की प्राप्ति | सुभद्रायै नमः |
( 2 वर्ष से कम और 10 वर्ष से अधिक आयू की कंजक पूजा योग्य नहीं होती )
पूजाः प्रत्येक कन्या को स्पर्श करते हुए बोलें ” ओं क्लीं कुलकुमारिकायै नमः ” मन्त्राक्षरमयीं लक्ष्मी मातृणांरूपधरिणीम । नवदुर्गात्मिकां साक्षात कन्यामावाहयाम्यहम् ।
पाद जल से साफ करनाः ओं क्लीं कुलकुमारिकायै नमः पाद्यं समर्पयामि
हाथ मुहं धुलाना : ओं क्लीं कुलकुमारिकायै नमः अर्घ्य समर्पयामि नमः
आचमन करानाः थोडा सा जल हाथ में देकर आचमन कराना ” ओं क्लीं कुमारिकायै आचमनीयं समर्पयामि नमः
वस्त्रःओं क्लीं कुमारिकायै वस्त्रं समर्पयामि नमः
गंध ( तिलक ) : ओं क्लीं कुमारिकायै समालबनम – गन्धो नमः
पुष्प अक्षतः फूल चढ़ाते हुये ” ओं क्लीं कुल – कुमारिकायै अर्को नमः , पुष्प नमः
भूषण आदिःओं क्लीं कुमारिकायै भूषणानि समर्पयामि नमः दौनों हाथ जोडकर अर्चना करें : ओं क्लीं कौमार्यै नमः , ओं कल्याण्यै नमः ओं कामिन्यै नमः , ओं शाङ्कर्यै नमः , ओं सुमद्रायै नमः , ओं त्रिपुरायै नमः , ओं रोहिण्यै नमः , ओ चण्डिकायै नमः , ओ दुर्गायै नमः
धूप चढ़ानाः ओं क्लीं कुलकुमारिकायै धुपं आघ्रापयामि नमः
रत्नद्वीप : ओ क्लीं कुलकुमारिकायै दीपं दर्शयामि नमः
नैवेद्ध अर्पण करनाः ओं क्लीं कुलकुमारिकायै नैवेद्यं निवेदयामि नमः नैवेद्य ( क्षीर , हल्वा इति ) गृहण करवाने के पश्चात् फिर आचमन करवाले । ” ओं क्लीं कुलकुमारिकायै अपोशानं नमः , आचमनीयं नमः
दक्षिणाः दक्षिणा चढाते हुये ” ओं क्लीं कुलकुमारिकायै दक्षणाये तिल रजत निषकर्णम ददामि ।
हाथ जोडकर अर्चणाः रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि । महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनी । आयुरारोग्यमैश्वर्यं देहि देवी नमोऽस्तुते ।।
नव दुर्गा भगवती का विसर्जनः देवी की धूप – दीप से पूजा ( आरती ) करलें उसके पश्चात पढ़ें : ( हाथ में चावल सहित दो ध्रुव काण्ड लें ) उत्तिष्ठ देवि चण्डेशि शुभां पूजां प्रगृह्य । कुरुष्व मे हि कल्याणं अष्टभिः शक्तिभिः सह ।। दुर्गेलक्ष्मी च वाग्देवि स्वस्थानं गच्छ पूजिते । संवत्सरे व्यतीते तु पुनरागमनाय वै ।। : , इमां पूजां मया देवी यथाशक्ति उपपादितास । रक्षार्थं त्वं समादाय व्रजस्व स्थानमुत्तमम ।।
श्री दुर्गां लक्ष्मी सरस्वती यथास्थानं प्रतिष्ठापयामि शोभनार्येक्षेमाय पुनरागमनाय च
( नमस्कारान् समर्पयामि )
जानुभ्याम , पानिभ्याम इति … अष्ठांग प्रणामं करोमि
श्री बगलामुखी हृदयमंत्र प्रयोग
हृदय मंत्र को देवता का हृदय कहा जाता है । इसके जप से देवता का सानिध्य बढ़ता है एवं सिद्ध होने पर दर्शन प्राप्त होते हैं । अपने गुरूदेव से इस मंत्र की दीक्षा लेकर ही इसका जप करें । कई बार ऐसा देखा गया है कि कुछ लोग साधना के प्रारम्भ में ही हृदय मंत्र का जप शुरू कर देते है और जैसे ही देवता का सानिध्य बढ़ता है तो घबरा जाते है और डर से अपनी साधना बीच में ही छोड़ देते है । इसलिए साधको को मेरा परामर्श है कि जब आपके गुरुदेव कहें तभी इसका जप करें । नये साधको को इसके स्थान पर बगलामुखी हृदय स्तोत्र का पाठ करना चाहिए ।
विनियोग- ॐ अस्य श्रीबगलामुखीहृदयमंत्रस्य नारदः ऋषिः , अनुष्टुप् छन्दः , श्रीबगलामुखीदेवता , ह्रीं बीजम् , क्लीं शक्तिः , ऐं कीलकम् , श्रीबगलामुखी प्रसन्नार्थे जपे विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यास ॐ नारदऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे । श्रीबगलामुखी देवतायै नमः हृदि । ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये । क्लीं शक्तये नमः पादयोः । ऐं कीलकाय नमः सर्वाङ्ग
करन्यास ॐ ह्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः । क्लीं तर्जनीभ्यां स्वाहा ।ऐं मध्यमाभ्यां वषट् ।ह्रीं अनामिकाभ्यां हुम् । क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट् । ऐं अस्त्राय फट् ।
हृदयादिन्यास ॐ ह्रीं हृदयाय नमः । क्लीं शिरसे स्वाहा । ऐं शिखायै वषट् ।ह्रीं कवचाय हुम् ।क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट् । ऐं अस्त्राय फट्
ध्यानम् बालभानुप्रतीकाशां नीलकोमलकुन्तलाम् । वन्देऽहं बगलां देवीं स्तम्भनास्त्ररुपिणीम् ।।
मंत्र- आं ह्रीं कों ग्लौं हुँ ऐं क्लीं श्रीं ह्रीं बगलामुखी ! आवेशय आवेशय , आं ह्रीं कों ब्रह्मास्त्ररुपिणी ! एहि एहि आं ह्रीं क्रों मम हृदये आवाहय आवाहय , सान्निध्यं कुरु कुरु आं ह्रीं कों ममैव हृदये चिरं तिष्ठ तिष्ठ , आं ह्रीं कों हुं फट् स्वाहा ।
Mantra : Aam Hleem Krom Glaum Hoom Aim Kleem Shreem Hreem Baglamukhi ! Aaveshaya Aaveshaya , Aam Hleem Krom BrahmastraRupini ! Aehi Aehi Aam Hleem Krom Mama Hridaye Aavahaya Avahaya , Saanidhyam Kuru Kuru Aam Hleem Krom Mameva Hridaye Chiram Tishth Tishth , Aam Hleem Krom Hoom Phat Swaha
प्रयोग- इस मंत्र का प्रयोग किसी विशेष परिस्थिति में ही करना चाहिए क्योंकि यह बहुत ही अधिक ही तीव्र है । मंत्र प्रयोग के बाद बगला गायत्री एवं मूल मंत्र का अनुष्ठान देवी की प्रसन्नता के लिए अवश्य करना चाहिए ।
सांख्यायनतंत्र में इस दुर्लभ मंत्र की प्रशंसा करते हुए कहा है कि इसके स्मरण मात्र से महादरिद्र व्यक्ति भी लक्ष्मीवान् हो जाता है , जड़ व्यक्ति पण्डित हो जाता है , चोर भी बुद्धिमान बन जाता है एवं निन्दित मनुष्य भी कीर्तिवान् हो जाता है । शत्रु पर इस मंत्र का प्रयोग करने से साधक का प्रतिष्ठावान् शत्रु भी समाज में उपहास व असम्मान का पात्र बनता है । इस मंत्र की साधना जापक को समस्त प्रकार से संतुष्ट रखती है । आस्थापूर्वक निरन्तर जप करने से जापक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है ।
मंत्र को सिद्ध करने के पश्चात् उक्त मंत्र से बंध्या स्त्री के गर्भाग का मार्जन करने से छह मास की अवधि में गर्भधारण करके पुत्र को जन्म देती है । इसके साथ में बगला कवच से अभिमंत्रित जल स्त्री को देना चाहिए ।
सूर्यादय के समय बगलाहृदय मंत्र से २१ बार अभिमंत्रित दूध पीने से छह मास के भीतर बन्ध्या भी पुत्र को जन्म देती है ।
शत्रु के अभिचारिक प्रयोग के कारण कोई भयानक रोग , व्याधि या महाभय उत्पन्न होने पर इस अमोघ मंत्र से १०८ बार अभिमंत्रित जल पीने से तुरन्त रोग या महाभय से . छुटकारा मिलता है ।
माँ दुर्गा की कृपा प्राप्ति हेतु सरल साधनाएं
प्रभावशाली दुर्गा साधना
मां दुर्गा का पूजन हिन्दू संस्कृती में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं यहीं कारण हैं की सैकड़ों वर्षों से देवी दुर्गा का पूजन छोटे – बड़े सभी प्रादेशिक क्षेत्रों में सर्वाधिक प्रचलित रहा हैं । देवी दुर्गा को आद्य शक्ति भगवती का साक्षात स्वरुप माना जाता हैं । देवी दुर्गा की महिमा अपरंपार हैं , जो अपने भक्तों के दुःखों का नाश करने वाली , दुष्टों से रक्षा करने वाली एवं अपने भक्तों के सकल मनोरथ को सिद्ध करने वाली साक्षात देवी हैं ।
साधना हेतु सामग्री : माला : स्फटिक दिशा : उत्तर या पूर्व आसन : लाल आसन वस्त्र : लाल वस्त्र , अन्य पूजन सामग्रीया : देवी प्रतिमा , पूजन हेतु सिंदूर , रक्तचंदन , लाल या पीले फूल , धूप , दीप , हवन हेतु तिल , घी , जौ , अक्षत , दूर्ब , दही , आदि नैवेद्य , पीतल या तांबे का कलश , कलश स्थापना हेतु गेहूं , आदि शुभ धान , आम के पल्लव , हवन हेतु लकड़ियां आदि हवन सामग्रीयां ।
मंत्र : ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाये विच्चै । ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाये विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ।।
Om Aim Hreem Kleem Chamundaye Vichchai | Om Gloum Hum Kleem Jum Sah Jvalaya Jvalaya Jvala Jvala Prajvala Prajvala Aim Hreem Kleem Chamundaye Vichchai Jvala Ham Sam Lam Ksham Phat Swaha ||
विधिः साधना से पूर्व पूजन स्थान की भूमि एवं सामग्री आदि को पवित्रिकरण करके विधि – विधान से स्वच्छ करलें । देवी दुर्गा की साधना प्रातःकाल से प्रारंभ करें । साधना का प्रारंभ नवरात्र में करना उत्तम माना गया हैं , यदि नवरात्र में साधना करना संभव न हो तो , साधना किसी भी मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा अर्थात एकम से प्रारंभ की जा सकती हैं , प्रतिपदा से लेकर दसवीं तिथि तक दस दिनों में साधना संपन्न करलें । आग्नेय कोण में वेदी बनाकर उत्तर दिशा या पूर्व की ओर मुख में आसन लगाये । विधि – विधान से कलश की स्थापना करें । कलश को गेहूं , धान आदि शुभ अन्न पर स्थापित करें । कलश में आम्रपल्लव के डंठल जलमे रहे इस प्रकार डाल दें । कलश पर दीपक प्रज्ज्वलित करके रख दें । फिर हवन कुंड को अग्नि से प्रज्ज्वलित करें । उक्त समस्त विधि – विधान करते हुवे मां दुर्गा के मंत्र का जप करते रहे । उक्त समस्त्र क्रिया के पश्चयात आसन पर बैठे बैठे देवी की तेजस्वी प्रतिमा या स्वरुप का त्राटक में ध्यान करते हुवे प्रतिमा को स्थापित करें । प्रतिमा को स्थापित कर । मंत्र पढ़ते हुवे अग्नि में हवि दें । दस दिनों तक प्रतिदिन 1188 मंत्रों का जप करें । मंत्र जप के दौरान देवी दुर्गा की प्रतिमा पर अपना ध्यान बनाये रखें ।
लाभ : उक्त विधि से साधना करने से मां दुर्गा के आशिर्वाद से साधक के आत्मबल , ओज , तेज , बल , पराक्रम में वृद्धि होती हैं , उसे स्वास्थ्यलाभ प्राप्त होता हैं । साधक को अपने कार्य में मनोवांछित सफलता की प्राप्ति होती हैं ।
दुर्गाष्टाक्षर मंत्र साधना
विधि : दुर्गाष्टाक्षर मंत्र अत्यंत गोपनीय हैं । शास्त्रों में दुर्गाष्टाक्षर मंत्र को शीघ्र सिद्धिदायक एवं दुर्लभ माना गया हैं । इस लिए दुर्गाष्टाक्षर मंत्र के बारे में उल्लेख किया गया हैं ..
साक्षात्सिद्धिप्रदो मंत्री दुर्गायाः कलिनाशनः । अष्टाक्षरो अष्ट सिद्धिशो गोपनीयो दिगंबरैः ।।
अर्थात : यह दुर्गा मंत्र साक्षात सिद्धि प्रदान करने वाला , कलेशों का नाश करने वाला हैं , आठ अक्षरों वाले इस मंत्र में अष्ट सिद्धि या समाहित हैं अतः यह अत्यंत गोपनीय हैं ।
विनियोग ॐ अस्य श्री दुर्गाष्टाक्षर मन्त्रस्य महेश्वर ऋषिः , श्री दुर्गाष्टाक्षरात्मिका देवता , दुं बीजम् । , ह्रीं शक्तिः , ॐ कीलकाय नमः इति दिग्बंधः , धर्मार्थ काम मोक्षार्थे जपे विनियोगः ।
ध्यान दुर्वानिभां त्रिनयनां विलसत्किरीटाम् , शंखाब्जख्ड्ग शर खेटक शूल चापान । संतर्जनी च दधतीं महिषासनस्था, दुर्गा नवारकुल पीठगतां भजेऽहम् ॥
मंत्र : ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः । Om Hreem Dum Durgayai Namah / /
लाभ : दुर्गाष्टाक्षर मंत्र का एक लाख जप करने से यह मंत्र सिद्ध होता है । जप हेतु प्रतिदिन निश्चित समय का चुनाव करें और प्रतिदिन अपनी सुविधा के अनुशार 5 , 11 , 21 दिन में में किसी निश्चित संख्या में एक लाख जप पूर्ण करें । मंत्र जाप पूर्ण होने के पश्चयात प्रतिदिन प्रातः एक माला जप करें । इस मंत्र में अद्भुत शक्ति समाहित होने से साधक को वाक् सिद्धि , संतान प्राप्ति , शत्रु विजय , रोग – मुक्ति और जीवन में सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए दुर्गाष्टाक्षर मंत्र अचूक एवं सिद्धिदायक है |
दुर्गा स्मृता मंत्र साधना
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाये विच्चे ॐ ह्रीं श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं कांसोस्मितां हिरण्य प्राकारा माद्राँज्वलन्ती तृप्तां तर्पयन्तीम् । पद्मेस्थितां पद्मवर्णा तामिहोपह्वये श्रियम् , ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गस्मृता हरसि भीतिमशेष जंतोः स्वस्थैः स्मृतामति मतीव शुभां ददासि । यदति , यच्च दूरके भयं विंदति मामिह पवमान वितज्जहि , दारिद्र्य दुःख भयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाद्रचित्ता ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कांसोस्मितां हिरण्य प्राकारा माद्राँज्वलन्ती तृप्तां तर्पयंती , पद्मेस्थितां पद्मम् वर्णा तामिहोपहव्ये श्रियम् , ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चै ।
उक्त दुर्गा स्मृता मंत्र के एक लाख जप करने से मंत्र सिद्ध होता हैं । जप पूर्ण होने पर मंत्र की दशांश होम करना चाहिए । दुर्गा स्मृता मंत्र के सिद्ध होने पर साधक को जीवन में सभी कार्यों में पूर्ण सिद्धियं प्राप्त होने लगती हैं । साधक संसार में सर्वत्र आदरणिय हो जाता हैं ।
दुर्गा साधना
साधना हेतु सामग्री : माला : स्फटिक | दिशा : उत्तर | जप संख्या : सवा लाख | आसन : सफेद | वस्त्र : लाल वस्त्र , | समय : रात्री काल | अन्य पूजन सामग्रीया : दुर्गा यंत्र , घी का दीप ,जलपात्र
मंत्र : हुँ’दुर्गायै नमः । Hum Durgayai Namah
विधि : किसी भी मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी या चतुर्दशी से यह प्रयोग प्रारंभ करें । विद्वानों का कथ हैं की पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वार से जाप करने से मां दुर्गा के दर्शन अवश्य होते हैं । मंत्र जाप की समाप्ति पर किसी कुंवारी कन्या को भोजन कराये उसे यथा शक्ति भेट एवं दक्षिणा दें कर प्रसन्न करने से यह साधना संपन्न होती हैं ।
लाभ : देवी दुर्गा की असिम कृपा प्राप्त होती हैं , साधक को जीवन में सभी प्रकार के सुख साधनों की प्राप्ति होती
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