
Pitru Paksha Shraddha -All You Need To Know
Pitru Paksha Shraddha -All You Need To Know
श्राद्ध कर्म का विधान
सजीव शरीर की समाप्ति मृत्यु से होती हैं मृत्यु के बाद में आत्मा शरीर को त्याग देती हैं
भारतीय दर्शन के अनुसार आत्मा जन्म के साथ ही शरीर में निहित होती हैं एवं मृत्यु के पश्चात् शरीर को त्याग देती हैं । आत्मा का मृत्यु के बाद में भी विनाश नहीं होता ।
श्रीमद्भगवदगीता में वर्णित हैं
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
अर्थातः मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता हैं , वेसे ही आत्मा पुराने शरीरों को छोड़कर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होती है ।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
अर्थातः इस आत्मा को शस्त्र से काटा नहीं जा सकता अग्नि उसे जला नहीं सकती , जल उसे गीला नहीं कर सकता और वायु उसे सुखा नहीं सकती हैं ।
आत्मा अमर है आत्मा ना कभी जन्म लेती हैं , ना उसकी मृत्यु होती हैं आत्मा इतनी सूक्ष्म होती हैं , कि जब वह शरीर को त्याग करके निकलती हैं , तब उसे कोई भी मनुष्य अपने चर्मचक्षु से नहीं देख सकता ।
वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥( श्वेताश्वतरोपनिषद् )
अर्थात् : बाल के अग्र भाग को सौ भागों में विभक्त कर दिया जाए और फिर पुनः उन सौ भागों में से एक के सौ भाग कर दिए जाएं तो उस भाग के बराबर या उसे भी छोटा – बहुत छोटा स्वरूप आत्मा का समझना चाहिए और जो अनंत भावयुक्त होने में समर्थ है ।
शरीर के माध्यम से आत्मा अपने द्वारा किये गये अच्छे – बुरे कर्मों के अनुरुप सुख – दुःख एवं स्वर्ग एवं नरक को प्राप्त करती है एक आत्मा बारंबार अलग अलग शरीर ( योनियों ) को धारण करती हैं प्रत्येक बार मृत्यु के पश्चात दूसरा जन्म अलग शरीर ( योनियों ) में होता है जीव के द्वारा किये गये कर्मो के अनुसार उसका नया शरीर निर्धारित होता हैं एक शरीर के त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश के लिए आत्मा को विभिन्न स्तरों से विचरण करना पड़ता है |
विद्वानों का मत हैं की केवल मनुष्य ही मृत्यु के बाद में एक आतिवाहिक ( जो मरने के बाद प्राप्त होनेवाला शरीर जिसे धारणकर जीव यमलोक में जाता हैं ) सूक्ष्म शरीर धारण कर सकता है किसी अन्य प्राणियोंको यह सूक्ष्म शरीर प्राप्त ही नहीं होता , अन्य प्राणि मृत्यु के तुरंत बाद वायुरूपमें विचरण करके तत्काल दूसरे प्राणि की योनि के गर्भ से जन्म लेने के लिए निर्धारीत हो जाते हैं ।
हिन्दू धर्म शास्त्रों – पुराणों में मरणासन्न मनुष्य की अवस्था , मनुष्य की मृत्यु का स्वरूप , मनुष्य के कल्याण के लिये किये जानेवाले अंतिम समय के विविध प्रकारके कर्म तथा दान इत्यादि का वर्णन प्राप्त होता है |
ग्रंथोंमें मृत्यु के बाद के औदैहिक संस्कार , पिण्डदान ( दशगात्रविधि ) , तर्पण , श्राद्ध , एकादशाह , सपिण्डीकरण ,अशौचादि निर्णय , कर्म विपाक , पापोंके प्रायश्चित्त इत्यादि कर्मों का वर्णन भी प्राप्त होता है । मनुष्य की मृत्युके बाद उसके पारलौकिक जीवन को सुख – समृद्ध एवं शांतिपूर्ण बनाया जा सकता है । मृत्युके बाद आत्मा की सद्दगति के लिए किये जाने वाले कर्तव्य की सामान्य जानकारी सभी को होनी चाहिए ।
शास्त्र में उल्लेख हैं कि
देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते । देवताभ्यो हि पूर्वं पितॄणामाप्यायनं वरम् ॥ ( हेमाद्रि )
अर्थात : देवकार्य की अपेक्षा पितृकार्य की विशेषता अधिक मानी गयी है इसलिए देवकार्य से पूर्व पितरों को तृप्त करना चाहिये ।
श्राद्धात् परतरं नान्यच्छ्रेयस्करमुदाहृतम् । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धम् कुर्याद् विचक्षणः ॥ ( हेमाद्रि )
अर्थात : श्राद्ध से उत्तम एवं कल्याणकारी अन्य कोई कर्म नहीं हैं इसलिए विधिवत श्राद्ध करते रहना चाहिये ।
एवं विधानतः श्राद्धम् कुर्यात् स्वविभवोचितम् । आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् प्रीणाति मानवः ॥ ( ब्रह्मपुराण )
अर्थात : जो विधि – विधान से अपने सामार्थ्य के अनुरुप श्राद्ध करता हैं , वह ब्रह्मा से लेकर घासतक सभी प्रकार के प्राणियों को संतृप्त कर देता हैं|
योऽनेन विधिना श्राद्धम् कुर्याद् वै शान्तमानसः व्यपेतकल्मषो नित्यं याति नावर्तते पुनः ॥ ( हेमाद्रिमें )
अर्थातः जो शांत चित से विधि – विधान से श्राद्ध करता है , वह व्यक्ति सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर जन्म – मृत्यु के बंधनों से छूट जाता हैं ।
जो नरक से त्राण ( रक्षा ) करता है , वही पुत्र है । श्राद्ध कर्म के द्वारा ही पुत्र पितृ ऋण से मुक्त हो सकता है |
शास्त्रोंके अनुसार स्वर्ग – नरक के फल भोगने के बाद जीव अपने कर्मों के अनुसार पुनः 84 लाख योनियों में भ्रमण करने लगता है । मृत्यु के बाद पुण्यात्माएं पुनः मनुष्य योनि अथवा देव योनि को प्राप्त कर लेते हैं तथा पापात्माएं अन्य प्राणियों की योनि में जन्म ग्रहण करते हैं ।
इस लिए पुत्र – पौत्रा इत्यादि का यह कर्तव्य है , कि वह अपने माता – पिता तथा स्वजनों की मृत्यु के बाद में उनहें परलोक में कल्याण अथवा एवं अन्य प्राणि की योनि में भी कल्याण तथा सुख की प्राप्ति के निमित्त श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त कर्म करना चाहिए । इस लिए हिन्दू धर्म में पितृऋण से मुक्ति के लिए श्राद्ध कर्म अथवा पितृकर्म किया जाता है ।
पितरो वाक्यमिच्छन्ति भावमिच्छन्ति देवताः ।
अर्थातः पितर वाक्य और क्रिया शुद्ध होने पर ही पूजा स्वीकार करते हैं और देवता भावना शुद्ध होने पर पूजा स्वीकार करते हैं ।
क्योकि देवता भावना शुद्ध होने पर पूजा तथा वाक्यमें कोई त्रुटि होने पर भी पूजा स्वीकार कर लेते हैं । लेकिन पितृ कर्म में अतिरिक्त सावधानी रखनी चाहिए ।
विभिन्न शास्त्रों – धर्मग्रंथों में वर्णित श्राद्ध कर्म की पद्धतियों के वर्णन में भिन्नता संभव हैं तथा विभिन्न प्रदेशों एवं लोक परम्पराओं में अंतर से भी इस में भिन्नता संभव हैं ।
विभिन्न शास्त्रों – धर्मग्रंथों एवं विद्वानों से हमें प्राप्त जानकारी के आधार पर पाठकों के मार्गदर्श हेतु सर्वाधिक प्रचलित श्राद्ध कर्म एवं जानकारीयों को समाहित करने का प्रयास किया हैं
श्राद्ध कर्म के प्रकार विभिन्न
शास्त्रों में श्राद्ध के अनेक प्रकार के वर्णित हैं लेकिन पाठको के मार्गदर्शन हेतु प्रचलित प्रकार का वर्णन कर रहे हैं ।
नित्यं नैमितिकं काम्यं त्रिविधं श्राद्धमुच्यते । ( मत्स्यपुराण )
अर्थात : नित्य , नैमित्तिक एवं काम्य श्राद्ध तीन प्रकार के होते हैं ।
नित्यं नैमित्तिक काम्यं वृद्धि श्राद्धम थापरम् । पार्वणं चेति विज्ञेयं श्राद्धं पञ्चविधं बुधैः ॥ ( यमस्मृति )
अर्थात : यम स्मृति में नित्य , नैमित्तिक , काम्य , नांदी एवं पार्वण कुल पांच प्रकार के श्राद्ध कर्म का उल्लेख मिलता है ।
अहन्यहनि यच्छ्राद्धं तन्नित्यमिति कीर्तितम् । वैश्वदेवविहीनम् तदशक्तावुदकेन तु ॥ ( भविष्यपुराण )
अर्थात : इसमें विश्वेदेवता नहीं होते तथा असमर्थता की अवस्था में केवल जल अर्पण करके इस श्राद्ध की पूर्ति हो सकती है ।
विश्वामित्रस्मृति तथा भविष्यपुराण में उल्लेख है
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धि श्राद्धं सपिण्डनम् । पार्वणं चेति विज्ञेयं गोष्ठी शुद्धयर्थमष्टमम् ॥ कर्माङ्ग नवमं प्रोक्तं दैविक दशमं स्मृतम् । यत्रास्वेकादशं प्रोक्तं पुष्ट्यर्थ द्वादशं स्मृतम् ॥
अर्थात : नित्य , नैमित्तिक , काम्य , वृद्धि , सपिण्डन , पार्वण , गोष्ठी , शुद्ध्यर्थ , कर्मांग , दैविक , यात्रार्थ तथा पुष्ट्यर्थ यह बारह प्रकार के श्राद्ध हैं ।
प्रतिदिन किसी कामना की पूर्ति के किये किये जाने वाले श्राद्ध को काम्य श्राद्ध कहते हैं । परिवार में सदस्यों की वृद्धिकाल में पुत्र जन्म तथा विवाह आदि मांगलिक कार्य में जो श्राद्ध किया जाता है , उसे वृद्धिश्राद्ध ( नान्दी श्राद्ध ) कहते हैं पितृपक्ष , अमावास्या अथवा पर्व आदि के समय आने पर जो विश्वेदेवता के सहित श्राद्ध किया जाता है , उसे पार्वण श्राद्ध कहते हैं ।
नित्य श्राद्धः नित्य श्राद्ध प्रतिदिन किया जाता हैं नित्य श्राद्ध में विश्वेदेवता को स्थापित नहीं किया जाता । नित्य श्राद्ध केवल जल – तर्पण ( जल से ) अथवा तिल – तर्पण से भी सम्पन्न किया जा सकता है
नैमित्तिक श्राद्धः किसी ( मृतक ) के निमित्त जो श्राद्ध किया जाता है , उसे नैमित्तिक श्राद्ध कहते हैं नैमित्तिक श्राद्ध को एकोद्दिष्ट श्राद्ध भी कहते है । नैमित्तिक श्राद्ध में किसी एक ( मृतक ) के निमित्त किया जाता हैं प्रायः यह किसी की मृत्यु के पश्चयात दशमें दिन या , ग्यारवे दिन किये जाते है इसमें भी विश्वेदेवों को स्थापित नहीं किया जाता हैं ।
काम्य श्राद्धः किसी कामना विशेष की पूर्ति के लिए जो श्राद्ध किया जाता हैं उसे काम्य श्राद्ध कहते हैं काम्य श्राद्ध को विशेष फल की प्राप्ति एवं इच्छापूर्ति के लिए विशेष दिन , तिथि एवं नक्षत्र पर किये जाते हैं
नान्दी श्राद्धः परिवार में सदस्यों की वृद्धि जैसे पुत्र जन्म तथा विवाह , मंगलीक कार्य के आरंभ में , सोलह संस्कारों के आरंभ में , पुण्याहवाचन के समय पर मांगलीक में किया जानेवाला श्राद्ध वृद्धिश्राद्ध ( नान्दी श्राद्ध ) कहा जाता है ।
पार्वण श्राद्धः किसी विशेष तिथि या पर्व जैसे पितृपक्ष ( महालय श्राद्ध ) , तीर्थ श्राद्ध , अमावास्या पर्व आदि पर किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है । इस के तीन प्रकार एकपार्वण , द्विपार्वण और त्रिपार्वण हैं , पार्वण श्राद्ध विश्वेदेव के सहित किया जाता है
सपिण्डन श्राद्धः शास्त्रों के मत से जब किसी की मृत्यु होती है , तो पिण्ड पहले प्रेत योनि में जाता है तथा प्रेत पिण्ड को निकालके उसे पितृ पिण्डों में मिलाने की क्रिया सपिण्डन श्राद्ध कहलाती है । इसे सपिंडीकरण श्राद्ध भी कहा जाता है ।
गोष्ठी श्राद्धः जो श्राद्ध समूह में किया जाता है उसे गोष्ठी श्राद्ध कहते हैं । प्रायः यह सामूहिक रुप से तीर्थक्षेत्र में अथवा किसी विशेष आवसर पर पितरों की शांति एवं सुख – समृद्धि की कामना से किया जाता हैं अन्यत मत से वंश वृद्धि की कामना से गौशाला में किया गया श्राद्ध ( दान ) गोष्ठी श्राद्ध कहलाता है
शुद्धि श्राद्धः स्वयं की शुद्धि के निमित जो श्राद्ध किया जाता हैं । उसे शुद्धि श्राद्ध कहते हैं । इसमें शुद्धि के लिए श्राद्धमें ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है , इसे शुद्धयर्थ श्राद्ध अथवा प्रायाश्चित्तांग श्राद्ध भी कहा जाता है
कर्मांग श्राद्धः गर्भाधान संस्कार , सीमन्तोन्नयन तथा पुंसवन आदि संस्कारों में जो श्राद्ध किया जाता हैं उसे कर्माग श्राद्ध कहते हैं ।
दैविक श्राद्धः किसी विशेष तिथि या अवसर पर देवता की कृपा प्राप्ति के लिए किए जाने वाले श्राद्ध को दैविक श्राद्ध कहते हैं
यात्रार्थ श्राद्धः तीर्थयात्रा अथवा अथवा दूरस्थ यात्रा पर जाने से पूर्व किए जाने वाले यात्रार्थ श्राद्ध कहते हैं पितरों को स्मरण कर यात्रा में सुरक्षा एवं विघ्न बाधाओं के निवारण के लिए यह श्राद्ध किया जाता है इस श्राद्ध को घी से किया जाता हैं । इसे घृत श्राद्ध भी कहते हैं
पुष्टि श्राद्धः शारीरिक या आर्थिक उन्नति के लिए जो श्राद्ध किया जाता हैं उसे पुष्टि श्राद्ध कहते हैं । इसे पुष्टयर्थ श्राद्ध भी कहते हैं ।
उपरोक्त वर्णित सभी प्रकार के श्राद्ध श्रौत और स्मार्त दो प्रकार के माने जाते हैं पिण्ड पितृयाग को श्रौत श्राद्ध कहा जाता हैं , तथा एकोद्दिष्ट एवं पार्वण , तीर्थ श्राद्ध से मरण तक के सभी श्राद्ध को स्मार्त श्राद्ध कहा जाता है ।
विद्वानों के मतानुसार पिण्ड पितृयाग केवल अमावस्याके दिन किया जाता हैं , और इसे विशेष ब्राह्मण वर्ग द्वारा ही किया जाता हैं ।
श्राद्ध कर्म का अर्थ
श्रद्धार्थमिदं श्राद्धम्
अर्थातः जो श्रद्धा से किया जाये वह श्राद्ध है ।
श्रद्धया पितृन उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तत् श्राद्धम् ।
अर्थात : पितरों के लिये विधि – विधान से जो कर्म श्रद्धा पूर्वक किये जाते है उसे श्राद्धकर्म कहते हैं ।
इस के पीछे का उद्देश्य पितरों के निमित्त , उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो कुछ अर्पित किया जाता हैं वह ही श्राद्ध कर्म हैं श्राद्धकर्म को पितृयज्ञ भी कहते हैं ।
श्राद्धकर्म का वर्णन मनुस्मृति , श्राद्धकल्पलता , श्राद्धतत्त्व , पितृदयिता आदि अनेक धर्म – शास्त्रों , पुराणों तथा ग्रन्थों में प्राप्त होता है ।
महर्षि पराशर के अनुसार
देशे काले च पात्रे च विधिना हविषा च यत् । तिलैर्दमैश्च मन्त्रैश्च श्राद्धं स्याच्छ्रद्धया युतम् ॥
अर्थात : देश , काल तथा पात्रमें हविष्या इत्यादि से विधिद्वारा जो कर्म तिल और दर्भ ( कुश ) एवं मन्त्रों के सहित श्रद्धापूर्वक किया जाए वही श्राद्ध है ।
ब्रह्मपुराण के अनुसार
देशे काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत् । पितृनुद्दिश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम् ॥
अर्थात : देश , काल और पात्रमें विधिपूर्वक श्रद्धासे पितरोंके निमित्त जो ब्राह्मणको दिया जाए उसे श्राद्ध कहते हैं ।
विद्वानों के मत से
संस्कृतं व्यञ्जनायं च पयोमधघतान्वितम । श्रद्धया दीयते यस्माच्छाद्धं तेन निगद्यते ॥
अर्थात : जिस कर्म में दुग्ध , घृत और मधु से युक्त अच्छी प्रकारसे पकाये हुए उत्तम व्यंजनको श्रद्धापूर्वक पितृगणके उद्देश्यसे ब्राह्मण आदि को दिया जाय उसे श्राद्ध कहते हैं
कात्यायन स्मृति के अनुसार
श्राद्धं वा पितृयज्ञः स्यात् ।
अर्थात : पितृयज्ञ का दूसरा नाम श्राद्ध हैं
श्राद्ध कर्म से लाभ की प्राप्ति
हेमाद्रि और कूर्मपुराण के अनुसार
योऽनेन विधिना श्राद्धं कुर्याद् वै शान्तमानसः । व्यपेतकल्मषो नित्यं याति नावर्तते पुनः ॥
अर्थात : जो शांत चित से विधि – विधान से श्राद्ध करता है , वह व्यक्ति सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर जन्म – मृत्यु के बंधनों से छूट कर फिर संसार – चक्रमें नहीं आता ।
विधि – विधान से श्राद्ध कर्म करने से पितरों की सन्तुष्टि तथा स्वयं का कल्याण होता हैं । विद्वानों का मत से श्राद्ध एक श्रेष्ठ कर्म हैं । नियम से श्राद्ध कर्म करने से पितृगण सन्तुष्ट होने से व्यक्तिको आरोग्य की प्राप्ति , आयु वृद्धी , सौभाग्य वृद्धि , इच्छाओं की पूर्ति , कार्य में सफलता , ज्ञान की प्राप्ति , भूमि – वाहन , धन लाभ तथा संतान लाभ मान – सम्मान आदि अनेक प्रकार के लाभ की प्राप्ति होती हैं तथा मृत्यु के बाद व्यक्ति का मोक्ष अथवा परलोक में कल्याण अथवा एवं अन्य प्राणि की योनि में भी कल्याण तथा सुख की प्राप्ति होती हैं ।
अत्रिसंहिता के अनुसार
पुत्रो वा भातरो वापि दौहित्रः पौत्रकस्तथा । पितृकार्ये प्रसक्ता ये ते यान्ति परमां गतिम् ॥
अर्थात : पुत्र , माता , पौत्र अथवा दौहित्र ( नाती ) आदि पितृकार्य करते हैं , वे निश्चय ही परम गति को प्राप्त होते हैं ।
विद्वानों का कथन हैं कि जो व्यक्ति श्राद्ध करता है , जो व्यक्ति श्राद्धकर्म के विधि – विधानको जानता है , जो व्यक्ति श्राद्धकर्म करनेकी सलाह देता है , जो व्यक्ति श्राद्ध का अनुमोदन करता है इन सब को श्राद्ध का पुण्य फल प्राप्त होता हैं ।
श्राद्ध कर्म में ब्राह्मण भोजन की महिमा
शास्त्रों में मुख्य रुप से श्राद्धकर्म की दो पद्धतियों का वर्णन किया गया हैं । पिण्डदान एवं ब्राह्मण भोजन । शास्त्र के अनुसार मृत्यु के बाद जो अन्तरिक्ष में सूक्ष्मग्राही जीवआत्मा वायवीय शरीर धारण किये होती है । सूक्ष्मग्राही शरीरधारी तथा जल , अग्नि तथा वायुप्रधान होने के कारण उन्हें कहीं पर भी आने – जाने में कोई समस्या नहीं होती ।
विशेष मन्त्रों के द्वारा जब उन्हें बुलाया जाता हैं , तब पितर मनकी गतिकी तरह स्मरण मात्रसे ही श्राद्ध के स्थान पर उपस्थित हो जाते हैं और आमंत्रित किये गये ब्राहाणों के माध्यम से भोजन ग्रहण कर तृप्त हो जाते हैं ।
अथर्ववेद के अनुसार
इममोदनं नि दधे ब्राहाणेषु विष्टारिणं लोकजितं स्वर्गम् ।
अर्थातः ब्राहाणों को भोजन कराने से वह भोजन पितरों को प्राप्त हो जाता है ।
मनुस्मृति के अनुसार
यस्यास्येन सदाश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः । कव्यानि चैव पितरः किं भूतमधिकं ततः ॥
अर्थात : ब्राह्मण के मुख के द्वारा देवता लोग हव्य भागों को और पितर लोग कव्यभागों को सदा खाया करते हैं । तथा श्राद्ध के लिए आमंत्रित किये गये ब्राह्मणों में पितर गुप्त रूप से निवास करते हैं और उन ब्राह्मणों के साथ ही बैठ कर भोजन ग्रहण करते हैं
शतपथ ब्राह्मण के अनुसार
तिर इव वै पितरो मनुष्येभ्य
अर्थातः सूक्ष्म शरीरधारी अथवा सूक्ष्मग्राही वायवीय शरीर होने के कारण पितर मनुष्यों से छिपे हुए से होते हैं ।
मृत्युतिथि तथा पितृपक्षमें श्राद्ध का महत्व
आज के आधुनिक युग में उचित जानकारी के अभाव में या समय के अभाव में या अत्याधुनिकी करण के चलते श्राद्ध इत्यादि कर्मों को अधिक महत्व नहीं देते हैं तथा कुछ लोग बगैर श्रद्धा – भाव से केवल इसे रीति – रिवाज मानकर श्राद्ध करते हैं । लेकिन आज के आधुनिक युग में भी कुछ लोग हैं जो यथाविधि नियम के अनुसार श्रद्धकर्म करते हैं ।
शास्त्रोक्त विधि से संपन्न किया गया श्राद्धकर्म ही सभी प्रकार से कल्याणदायक होता है । इसलिए व्यक्तिको श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त मत के समस्त अथवा यथासंभव विशेष अवसरो पर श्राद्ध करते रहना चाहिये । जो व्यक्ति शास्त्रोक्त मत के समस्त श्राद्धकर्मों को करने में असमर्थ हो उन्हें क्षय तिथि पर , वार्षिक तिथि पर एवं पितृपक्ष में अपने मृत पितृगण की मरण तिथि के दिन श्राद्धकर्म अवश्य करना चाहिए ।
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमासे पितरोंका दिन प्रारम्भ हो जाता हैं , जो कृष्ण पक्ष की अमावास्या तक रहता है ।
हमारे एक मास के बराबर पितरों का एक अहोरात्र ( अर्थात दिन – रात ) होता है ।
मनुस्मृति के अनुसार जिस प्रकार मासमें दो पक्ष होते है , मनुष्यों का कृष्ण पक्ष पितरों के कर्म का दिन और शुक्ल पक्ष पितरों के सोने की रात होती है ।
इसलिए आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में अर्थात पितृपक्ष में पितृ के निमित्त श्राद्धकर्म करने का विधान है । इसी पक्ष में किये गये श्राद्ध कर्म से पितरोंको भोजन प्राप्त होता है ।
श्राद्ध के मुख्य दो अवसरों का महत्व
शास्त्रो में वर्णित हैं की व्यक्ति के लिए वर्ष में कम से कम दो बार श्राद्ध करना अनिवार्य है । इसके अतिरिक्त विशेष अवसरों पर श्राद्ध करनेकी विधि बतायी गई है ।
क्षय तिथि ( मृत्यु कि तिथि ) :
जिस दिन व्यक्ति की मृत्यु होती है , उस तिथि के दिन वार्षिक श्राद्ध करना चाहिये । शास्त्रों में क्षय तिथि पर एकोद्दिष्ट श्राद्ध करने का विधान बताया गया हैं इसी को कुछ लोग पार्वण श्राद्ध भी कहते हैं क्योंकि यह विशेष तिथि पर किया जाता है ) ।
साधारणतः एकोद्दिष्ट श्राद्ध केवल मृत व्यक्ति के निमित्त एक पिण्ड का दान करके तथा कम से कम एक ब्राह्मण को और अधिक तम तीन ब्राह्मणों को भोजन कराया जाय ।
पितृपक्षः
शास्त्रों में पितृ पक्ष में मृत व्यक्ति की जो मृत्यु तिथि होती हैं , उस तिथि पर विशेष रुप से पार्वण श्राद्ध करनेका विधान बताया गया हैं । यथा सम्भव पिता की मृत्यु तिथि पर श्राद्धकर्म अवश्य करना चाहिये । पार्वण श्राद्ध में पिता , दादा , परदादा , माता , दादी और परदादी तीन चट में इन छ : व्यक्तियों का श्राद्ध किया जाता है ।
इसके साथ ही नाना , परनाना , वृद्ध परनाना , नानी , परनानी वृद्ध परनानी तीन चट में इन छ : व्यक्तियों का भी श्राद्ध किया जाता है । इसके अलावा एक चट और लगाया जाता है , जिस में अपने निकटतम सम्बन्धियोंके निमित्त पिण्डदान किया जाता है ।
इसके अलावा दो चट विश्वेदेव के लिये लगाए जाता है , इस तर कुल नौ चट लगाकर पार्वण श्राद्ध को सम्पन्न किया जाता है । तथा इस में नौ ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है । और कम से कम तीन ब्राह्मणों को भोजन कराया जा सकता है यदि योग्य ब्राह्मण की उपलब्धता न हो तो कम से कम एक सात्त्विक ब्राह्मण को भोजन अवश्य कराए ।
श्राद्ध के निमित्त दान का महत्व
श्राद्ध का दान देते समय कुछ सावधानियां बरतने का विधान शास्त्रों में वर्णित हैं ।
दान देते समय अपने हाथ में काले तिल , जौ और कुश के साथ पानी लेकर ब्राह्मण को दान देना चाहिए , जिससे उसका शुभ फल पितरों तक पहुँच सके , अन्यथा इसका हिस्सा असुर ले जाते हैं ।
दान देते समय ब्राह्मण के हाथ में अक्षत देकर यह मंत्र का उच्चारण किया जाता है ।
अक्षतं चास्तु में पुण्यं शांति पुष्टिकृतिश्च मे । यदिच्छ्रेयस् कर्मलोके तदस्तु सदा मम ।।
अर्थात : मेरा पुण्य अक्षय हो मुझे शांति , पुष्टि और धृति प्राप्त हो । लोक में जो कल्याणकारी वस्तुएँ हैं , वह सदा मुझे प्राप्त होती रहें ।
पितरों को केवल श्रद्धा से ही बुलाकर तृप्त किया जा सकता है । सिर्फ कर्मकाण्ड या वस्तुओं तृप्त नहीं किया जा सकता है ।
श्राद्ध में रजत ( चाँदी ) का दान उत्तम होता है । चाँदी के अभाव में उसका दर्शन अथवा उसका स्मरण भी पितरों को अनन्त एवं अक्षय स्वर्ग देनेवाला दान माना जाता है ।
विद्वानों का कथन हैं की योग्य संतान चोंदी के दान से अपने पितरों को तारते हैं । सुवर्ण निर्मित , चाँदी निर्मित , ताम्र निर्मित वस्तुएं , तिल , वस्त्र , कुश का तृण , कम्बल , अन्य पवित्र वस्तुएँ ।
श्राद्ध में ब्राह्मणों को अन्न देने में असमर्थ हो तो ब्राह्मणों को कंदमूल , फल , शाक एवं यथा शक्ति दक्षिणा दे सकते है यदि इतना करने में असमर्थ हो तो किसी भी श्रेष्ठ ब्राह्म को प्रणाम करके एक मुट्ठी काले तिल दे सकते है या पितरों के निमित भूमि पर श्रद्धा – पूर्वक एवं नम्रता अल्प तिलों से युक्त जलांजलि दे सकते है ।
यदि इसका भी करने में असमर्थ हो तो किसी भी प्रकार से एक दिन का घास लाकर श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त से गौ को खिलाये ।
अतः धन के अभाव में श्रद्धा पूर्वक जो अर्पण किया जाता हैं पितर उससे वे तृप्त होते हैं



