
Varuthini Ekadashi 2021-UK Significance &All you need to know

Varuthini Ekadashi
Varuthini Ekadashi on Friday, May 7, 2021
Ekadashi Tithi Begins – 09:40 AM on May 06, 2021
Ekadashi Tithi Ends – 11:02 AM on May 07, 2021
On 8th May, Parana Time – 05:20 AM to 08:23 AM
Varuthini Ekadashi significance
Varuthini Ekadashi Vrat gaurds devotees against troubles, sorrows or evil. Varuthini means armoured or protected. Hence, devotees observe a vrat on this day for a blissful life free of agony and full of good fortune.
By keeping a fast on this day, a devotee can seek the blessings of Lord Vishnu and lead a prosperous life.
The tradition of observing a vrat on this Ekadashi finds a mention in the Bhavishya Purana. The importance of this Ekadashi is said to have been narrated to Pandava King Yudhishthira by Shri Krishna himself.
On this day, the fifth avatar of Lord Vishnu, Vamana, is worshipped.
The ultimate aim of the Ekadashi Vrat is to attain Moksha (liberation from the vicious cycle of birth, life and death). Hence devotees worship Lord Vishnu (hailed as Palan Karta) and hope to seek shelter in Vaikuntha, his heavenly abode, after their journey on the Earth comes to an end.
Varuthini Ekadashi Vrat Katha
अर्जुन ने कहा- “हे प्रभु! वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसका क्या विधान है और उससे किस फल की प्राप्ति होती है, सो कृपापूर्वक विस्तार से बताएँ।”
अर्जुन की बात सुन श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम बरूथिनी एकादशी है। यह सौभाग्य प्रदान करने वाली है। इसका उपवास करने से प्राणी के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि इस उपवास को दुखी सधवा स्त्री करती है, तो उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है। बरूथिनी एकादशी के प्रभाव से ही राजा मान्धाता को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। इसी प्रकार धुन्धुमार आदि भी स्वर्ग को गए थे। बरूथिनी एकादशी के उपवास का फल दस सहस्र वर्ष तपस्या करने के फल के समान है।
कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के समय जो फल एक बार स्वर्ण दान करने से प्राप्त होता है, वही फल बरूथिनी एकादशी का उपवास करने से प्राप्त होता है। इस व्रत से प्राणी इहलोक और परलोक दोनों में सुख पाते हैं व अन्त में स्वर्ग के भागी बनते हैं।
हे राजन! इस एकादशी का उपवास करने से मनुष्य को इहलोक में सुख और परलोक में मुक्ति प्राप्त होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि घोड़े के दान से हाथी का दान श्रेष्ठ है और हाथी के दान से भूमि का दान श्रेष्ठ है, इनमें श्रेष्ठ तिलों का दान है। तिल के दान से श्रेष्ठ है स्वर्ण का दान और स्वर्ण के दान से श्रेष्ठ है अन्न-दान। संसार में अन्न-दान से श्रेष्ठ कोई भी दान नहीं है। अन्न-दान से पितृ, देवता, मनुष्य आदि सब तृप्त हो जाते हैं। कन्यादान को शास्त्रों में अन्न-दान के समान माना गया है।
बरूथिनी एकादशी के व्रत से अन्नदान तथा कन्यादान दोनों श्रेष्ठ दानों का फल मिलता है। जो मनुष्य लालचवश कन्या का धन ले लेते हैं या आलस्य और कामचोरी के कारण कन्या के धन का भक्षण करते हैं, वे प्रलय के अन्त तक नरक भोगते रहते हैं या उनको अगले जन्म में बिलाव योनि में जाना पड़ता है।
जो प्राणी प्रेम से तथा यज्ञ सहित कन्यादान करते हैं, उनके पुण्य को चित्रगुप्त भी लिखने में असमर्थ हो जाते हैं। जो प्राणी इस बरूथिनी एकादशी का उपवास करते हैं, उन्हें कन्यादान का फल प्राप्त होता है। बरूथिनी एकादशी का व्रत करने वाले को दशमी के दिन से निम्नलिखित वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिये-
कांसे के बर्तन में भोजन करना
मांस
मसूर की दाल
चना
कोदों
शाक
मधु (शहद)
दूसरे का अन्न
दूसरी बार भोजन करना
व्रती को पूर्ण ब्रह्मचर्य से रहना चाहिये। रात को सोना नहीं चाहिये, अपितु सारा समय शास्त्र चिन्तन और भजन-कीर्तन आदि में लगाना चाहिये। दूसरों की निन्दा तथा नीच पापी लोगों की संगत भी नहीं करनी चाहिये। क्रोध करना या झूठ बोलना भी वर्जित है। तेल तथा अन्न भक्षण की भी मनाही है।
हे राजन! जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत विधानपूर्वक करते हैं, उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है, अतः मनुष्य को निकृष्ट कर्मों से डरना चाहिये। इस व्रत के माहात्म्य को पढ़ने से एक सहस्र गौदान का पुण्य प्राप्त होता है। इसका फल गंगा स्नान करने के फल से भी अधिक है।
कथा-सार
सौभाग्य का आधार संयम है। हर प्रकार संयम रखने से मनुष्य के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। यदि प्राणी में संयम नहीं है तो उसके द्वारा किये गए तप, त्याग व भक्ति-पूजा आदि सब व्यर्थ हो जाते हैं।
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