
Anant Chaturdashi – Significance And Rituals
- Categories Shashtra Puran / History
Anant Chaturdashi
अनंत चतुर्दशी का व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता हैं । इस दिन भगवान नारायण की कथा की जाती है । इस दिन अनन्त भगवान की पूजा करके भक्तगण वेद – ग्रंथों का पाठ करके संकटों से रक्षा करने वाला अनन्तसूत्रबांधा जाता हैं |
अनंत चतुर्दशी व्रत की पूजा दोपहर में की जाती हैं ।
व्रत – पूजन विधान :-
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- अनंत चतुर्दशी का व्रत वाले दिन व्रती को प्रातः स्नान करके निम्न मंत्र से संकल्प करना चाहिये ।
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- ममाखिलपापक्षयपूर्वक शुभफलवृद्धये श्रीमदनंतप्रीतिकामनया अनंतव्रतमहं करिष्ये ।
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- शास्त्रों में यद्यपि व्रत का संकल्प एवं पूजन किसी पवित्र नदी या सरोवर के तट पर करने का विधान है , यदि यह संभव न हो तो घर में पूजागृह की स्वच्छ भूमि को सुशोभित करके कलश स्थापित करें ।
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- कलश पर अष्टदल कमल के समान बने बर्तन पर शेषनाग की शैय्यापर लेटे भगवान विष्णु की मूर्ति अथवा चित्र को रखें ।
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- मूर्ति के सम्मुख कुमकुम , केसर या हल्दी से रंगा चौदह गाँठों वाला ‘ अनंत ‘ अर्थात सूत्र या धागा भी रखें ।
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- इसके बाद ॐ अनन्तायनम: मंत्र से भगवान विष्णु तथा अनंतसूत्रकी षोडशोपचार – विधिसे पूजा करें ।
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- पूजनोपरांत अनन्तसूत्रको मंत्र पढकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें :
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- अनन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव । अनंतरूपेविनियोजितात्मायनन्तरूपायनमोनमस्ते ।
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- नवीन अनंत को धारण कर पुराने का त्याग निम्न मंत्र से करें
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- न्यूनातिरिक्तानि परिस्फुटानि यानीह कर्माणि मया कृतानि । सर्वाणि चैतानि मम क्षमस्व प्रयाहि तुष्टः पुनरागमाय ॥
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- अनंतसूत्रबांध लेने के पश्चात किसी ब्राह्मण को नैवेद्य ( भोग ) में निवेदित पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें ।
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- पूजा के बाद व्रत – कथा को पढ़ें या सुनें ।
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- अनंत व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा अनंत फलदायक माना गया है ।
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- अनंत व्रत में भगवान विष्णु से धन – पुत्रादि की कामना से किया जाता है
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- विद्वानो के मत से अनंत की चौदह गांठे चौदह लोकों की प्रतीक हैं , जिनमें अनंत भगवान विद्यमान हैं |
अनंत चतुर्दशी व्रतकथा
पोराणिक कथाके अनुशार एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूययज्ञ किया । यज्ञमंडप का निर्माण अति सुंदर था ही , अद्भुत भी था । उसमें जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति उत्पन्न होती थी । पूरी सावधानी के बाद भी बहुत से अतिथि उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे । दुर्योधन भी उस यज्ञमंडप में घूमते हुए स्थल के श्रम में एक तालाब में गिर गए ।
तब भीमसेन तथा द्रौपदी ने ‘ अंधों की संतान अंधी ‘ कहकर दुर्योधन का मजाक उड़ाया । इससे दुर्योधन चिढ़ गया । उसके मन में द्वेष पैदा हो गया और मस्तिक में उस अपमान का बदला लेने के विचार उपजने लगे । काफी दिनों तक वह इसी उल्झन में रहा कि आखिर पाँडवों से अपने अपमान का बदला किस प्रकार लिया जाए । तभी उसके मस्तिष्क में दयूत क्रीड़ा में पांडवों को हराकर उस अपमान का बदला लेने की युक्ति आई । उसने पांडवों को जुए के लिए न केवल आमंत्रित ही किया बल्कि उन्हें जुए में पराजित भी कर दिया ।
पराजित होकर पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भोगना पड़ा । वन में रहते हुए पाँडव अनेक कष्ट सहते रहे । एक दिन वन में युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से अपना दुःख कहा तथा उसको दूर करने का उपाय पूछा । तब श्रीकृष्ण ने कहा- हे युधिष्ठिर ! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो । इससे तुम्हारे सारे संकट दूर हो जाएगा । तुम्हें हारा हुआ राज्य भी वापस मिल जाएगा ।
युधिष्ठिर के आग्रह पर इस संदर्भ में श्रीकृष्ण एक कथा सुनाते हुए बोले- प्राचीन काल में सुमन्तु ब्राह्मण की परम सुंदरी तथा धर्मपरायण सुशीला नामक कन्या थी विवाह योग्य होने पर ब्राह्मण ने उसका विवाह कौंडिन्य ऋषि से कर दिया कौडिन्य ऋषि सुशीला को लेकर अपने आश्रम की ओर चले तो रास्ते में ही रात हो गई । वे एक नदी के तट पर संध्या करने लगे ।
सुशीला ने देखा- वहाँ पर बहुत – सी स्त्रियाँ सुंदर सुंदर वस्त्र धारण करके किसी देवता की पूजा कर रही हैं । उत्सुकतावश सुशीला ने उनसे उस पूजन के विषय में पूछा तो उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बता दी । सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान करके चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बाँधा और अपने पति के पास आ गई ।
कौडिन्य ऋषि ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात स्पष्ट कर दी । परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौडिन्य ऋषि को इससे कोई प्रसन्नता नहीं हुई , बल्कि क्रोध में आकर उन्होंने उसके हाथ में बंधे डोरे को तोड़कर आग में जला दिया ।
यह अनंतजी का घोर अपमान था । उनके इस दुष्कर्म का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया । कौडिन्य मुनि दुःखी रहने लगे ।
उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई । इस दरिद्रता का कारण पूछने पर सुशीला ने डोरे जलाने की बात दोहराई । तब पश्चाताप करते हुए ऋषि ‘ अनंत ‘ की प्राप्ति के लिए वन में निकल गए ।
जब वे भटकते – भटकते निराश होकर गिर पड़े तो भगवान अनंत प्रकट होकर बोले- ‘ हे कौडिन्य ! मेरे तिरस्कार के कारण ही तुम दुःखी हुए हो लेकिन तुमने पश्चाताप किया है . अतः मैं प्रसन्न हूँ पर घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो । चौदह वर्ष पर्यन्त व्रत करने से तुम्हारा सारा दुःख दूर हो जाएगा । तुम्हें अनंत सम्पत्ति मिलेगी ।
कौडिन्य ऋषि ने वैसा ही किया । उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई । श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी भगवान अनंत का व्रत किया जिसके प्रभाव से पॉडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए तथा चिरकाल तक निष्कंटक राज्य करते रहे ।
Acharya Pranav Pathak loves to share the divine wisdom of Vedic culture, especially the message of Lord Rama.



